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Shakeel Badayuni: 'मैं शकील दिल का हूं तर्जुमा...', सरकारी नौकरी छोड़ ऐसे बने गीतकार, सिर्फ एक लाइन ने दिलाया फिल्मों में काम 

एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: निधि पाल Updated Wed, 20 Apr 2022 07:38 AM IST
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शकील बदायूंनी - फोटो : सोशल मीडिया

गीतकारों की बात हो या कवियों की अभिनेताओं की बात हो या राजनेताओं की उत्तर प्रदेश हर मायने में खास है। इस प्रदेश ने फिल्म इंडस्ट्री को ऐसे चमकते सितारे दिए हैं कि शायद मरने के बाद भी उनकी चमक कभी फीकी न पड़े। इसी प्रदेश का एक छोटा सा जिला है बदायूं। ये जिला तीन चीजों पीर, पेड़े और कवियों के लिए मशहूर है। पीर, पेड़ों से इतर अगर हम कवियों की बात कर लें तो इस जिले ने दिलावर फिगार, अदा जाफरी, फानी बदायूंनी, इस्मत चुगताई और शकील बदायूंनी जैसे नामी शायर पैदा किए हैं। लेकिन आज हम इन सभी कवियों की नहीं बल्कि उस एक कवि की बात करने जा रहे हैं, जिसने हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी सिनेमा को भी अपने शानदार नगमों से सजाया।

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शकील बदायूंनी - फोटो : सोशल मीडिया

'ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया...' अब तो आप समझ ही गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं शकील बदायूंनी की। कल यानि 20 अप्रैल को इनकी पुण्यतिथि है। शकील बदायूंनी ने अपने करियर में एक से बढ़कर एक हिट गाने दिए और आज भी लोग उन्हें सुनना पसंद करते हैं। 3 अगस्त 1916 को जन्में शकील के पिता मोहम्मद जमाल अहमद कादरी चाहते थे उनका बेटा कुछ बेहतर करे। इसके लिए उन्होंने घर पर ही उर्दू, फारसी, अरबी और हिंदी के लिए ट्यूशन लगवा दिया। 

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शकील बदायूंनी - फोटो : Social media

शकील के घर में तो कोई शायर नहीं था, लेकिन घर से इतर जिला बदायूं में और रिश्तेदार शेरों-शायरी करते थे। इसी का उनके जीवन पर असर पड़ा और वह शायरियां कहने लगे। साल 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दिल्ली में ही एक सप्लाई ऑफिसर की नौकरी करने लगे, लेकिन उन्होंने मुशायरों को नहीं छोड़ा। शकील की शायरी में सिर्फ रोमांस और दर्द होता था। हिंदी सिनेमा के लिए भी इन्होंने ज्यादातर रोमांटिक और दर्दभरे गाने ही गाए हैं।

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शकील बदायूंनी

शकील के मुशायरे से जुड़े किस्से के बारे में एक बार निदा फाजली ने कहा था कि शकील को एक बार किसी गाने के लिए भरी महफिल में डांट पड़ी थी। हुआ यूं था कि ग्वालियर में एक मुशायरा चल रहा था। मुशायरे में नागपुर के मिर्जा दाग के शिष्य और हजरत नातिक गुलाम भी पहुंचे। इस दौरान शकील ने उनके स्वागत में शेर पढ़ा- 'चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो।' शकील के मुंह से खुद का लिखा शेर सुनकर नतिक साहब भड़क गए। उन्होंने भरी महफिल में शकील को सबके सामने डांट दिया। 

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शकील बदायूंनी - फोटो : सोशल मीडिया

चार साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद शकील को लगा कि अब उन्हें हिंदी सिनेमा के लिए गाना चाहिए। बस फिर गीतकार बनने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी और चले आए मायानगरी। यहां उनकी मुलाकात संगीतकार नौशाद से हुई। नौशाद ने उनसे कुछ सुनाने को कहा तो शकील ने कहा- 'हम दर्द का अफसाना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की आग लगा देंगे।' इसके बाद तो शकील और नौशाद ने करीब 20 साल हिंदी फिल्मों के लिए गाने लिखे। 

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