कोई फिल्म निर्देशक बिल्कुल विपरीत ध्रुवी फिल्मों का निर्माण करे तो उसके सिनेमा को एकाएक तीन पीढ़ियों की नुमाइंदगी हासिल होती है। जैसे, यश चोपड़ा ने ‘दीवार’ बनाई। ‘दिल तो पागल है’ बनाई और बनाई ‘वीर जारा’। ये फिल्म मेकिंग के दो यश चोपड़ा है। वैसे ही हिंदी सिनेमा के दो अनुभव सिन्हा भी हैं। एक ‘तुम बिन’, ‘रा-वन’ और सोनू निगम के म्यूजिक वीडियो निर्देशित करने वाले। दूसरे अनुभव हैं, ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’ और ‘थप्पड़’ निर्देशित करने वाले। इन्हीं गर्मियों में अपनी अगली फिल्म शुरू करने जा रहे निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
Anubhav Sinha Exclusive: मेरी अधिकतर फिल्मों की कहानियां अखबारों से आई हैं, हमें घूमफिरकर किताबों पर ही आना है
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आपका परिचय निर्माता-निर्देशक के रूप में दिया जाए तो आपको शिकायत होती है कि लेखक के रूप में आपका परिचय क्यों नहीं दिया जाता। आप बताएंगे कि लिखना आपने कब से शुरू किया?
मेरे लेखक बनने का पूरा श्रेय अभिनेता और लेखक सौरभ शुक्ला को जाता है। मेरी पहली टीवी सीरीज ‘शिकस्त’ मैं और सौरभ मिलकर लिख रहे थे। तभी बीच में तिग्मांशु धूलिया ने उन्हें अपनी सीरीज में एक किरदार दे दिया। अहम किरदार था तो सौरभ उसे करने चले गए। मैंने उससे पहले किसी अखबार या पत्रिका तक के लिए कहानी नहीं लिखी थी। एक दो बड़े लेखकों का सहायक जरूर रहा लेकिन ये समस्या सामने आई तो मैंने सोचा कि हम तो बड़े ही ऐसे हुए हैं कि घरवालों ने तैरना सिखाने की बजाय सीधे तालाब में उठाकर फेंक दिया कि जाओ, सीखो। बस वैसा ही कुछ मन में इरादा लिए लिखना शुरू कर दिया। तब से लगातार लिख रहा हूं। 1993 से गिनें तो 32 साल तो हो ही गए।
और, ‘रा वन’ के बाद के अनुभव सिन्हा को खोजने वाली फिल्म ‘मुल्क’ भी आपने ही लिखी? इसका विचार कहां से आया?
ये फिल्म मैंने कुछ खास सोचकर या किसी खास लम्हे से प्रेरित होकर लिखी हो, ऐसा मैं अब तक पता लगा नहीं पाया हूं। बहुत बार इस पूरे घटनाक्रम को मैंने रिवाइंड करके प्ले भी किया। लेकिन, हां ये पता है कि ‘रा वन’ के बाद जो तिरस्कार, जो अपमान मेरा हुआ, उसे सहन करना आसान नहीं था। मैं इस शहर में अकेला ही हूं, अब जाकर एक दो दोस्त बने हैं, जिनको फोन करके बात कर सकता हूं लेकिन तब वैसा भी नहीं था। मैं सोचता रहता था कि मेरा ये तिरस्कार सही नहीं है, मैं इससे बेहतर कर सकता हूं। और, उसी बीच में दिमाग में ये कहानी आई और इस कहानी ने ही मुझसे ये फिल्म बनवा दी।
कोई किताब पढ़ी आपने या कोई घटना आई आपके सामने?
एक घटना थी, शायद किसी अखबार में पढ़ी थी मैंने कि एक बाप ने अपने बेटे के शव को लेने से मना कर दिया। वहीं से इसका ट्रिगर पॉइंट मान सकते हैं। पिछले एक दशक की मेरी फिल्में देखेंगे तो मेरी ज्यादातर फिल्मों की कहानियां अखबारों से ही आई हैं। और, ‘मुल्क’ जब रिलीज हुई तो लोग इसके लेखक-निर्देशक की बात करने लगे जोकि मैं था। वहां मैंने अपने को पाया और मुझे लगा कि मेरा सिनेमा मेरे भीतर से आने वाली आवाज में है। उसके बाद जो भी फिल्में मैं सोचता या लिखता हूं, वह वही हैं जो मेरे अंदर से आती हैं, उसमें बाजार का कोई भी कारण नहीं होता।
अनुभव सिन्हा के सिनेमा को लोग अलग से वैसे ही पहचानते हैं, जैसे भंसाली के सिनेमा को। आप मुतमइन हैं अपनी इस पहचान से?
ये मैं मानता हूं कि सिनेमा से बनने वाली पहचान निर्देशक की सबसे बड़ी पहचान होती है। लेकिन, यही पहचान मेरी आखिरी पहचान है, इसे लेकर मैं अभी मुतमइन नहीं हूं। मुझे पता नहीं है। मैं रोज अपने को बदलता देख रहा हूं। बढ़ता देख रहा हूं। बहुत सारा सिनेमा इन दिनों मैं देख रहा हूं। तमाम किताबें पढ़ रहा हूं और इस सबसे चलते हुआ ये है कि मैं रोज बदल रहा हूं। मैं 1890 में जो कुछ शूट हुआ, वहां से लेकर हाल ही में ऑस्कर तक जो पहुंचा है, वह सब देख रहा हूं। मुझे ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्सुकता रहती है।

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