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Sandhya Suri Interview: भ्रष्ट पुलिस सिर्फ भारत की समस्या नहीं है, ‘संतोष’ की रिसर्च में मुझे लगे पूरे 10 साल
इस बार ऑस्कर पुरस्कारों के मुकाबले में एक हिंदी फिल्म ‘संतोष’ ब्रिटेन की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में शामिल है। सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी में ये फिल्म अंतिम 15 तक पहुंच चुकी है। अगले महीने पीवीआर आइनॉक्स के जरिये भारत में रिलीज होने जा रही इस फिल्म की कहानी, इसके किरदार उन सब जगहों के हैं जहां अब भी जातिवाद, भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसी बातें मौजूद हैं। फिल्म की कहानी गाजिलियाबाद, नेहरट और चिराग प्रदेश में घटती है, इनके नाम ऐसे क्यों हैं, फिल्म की कहानी के पीछे का शोध कितना गहरा है और भारत से संध्या सूरी का रिश्ता कितना पुराना है, इस बारे में बता रही हैं फिल्म ‘संतोष’ की निर्देशक संध्या सूरी, इस खास बातचीत में ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल को।
फिल्म ‘संतोष’ में एक पुलिस कॉन्स्टेबल का किरदार लिखते समय शहाना गोस्वामी ही थीं आपकी सोच में?
ये सब तो हम बाद में सोचते हैं। मैंने शहाना के लिए नहीं लिखी फिल्म, मैंने बस एक किरदार ‘संतोष’ लिखा है। ये एक जटिल किरदार है। वह एकदम मासूम नहीं है। वह एकदम सीधी सादी लड़की भी नहीं है। ऐसा नहीं कि उसकी कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। उसके अंदर एक भूख है, उसे जिंदगी से कुछ और चाहिए। वह कहीं कठोर है, कहीं दयालु है। विधवा है तो एक दुख भी साथ लेकर चल रही है और ये सब उसे अपने भीतर समेटकर चलना है। ये एक भावुक फिल्म है।
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फिल्म- संतोष
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जातिवाद को भी ‘संतोष’ की अंतर्धारा बनाया गया है। लंदन में रहकर भारत की इस सामाजिक पृष्ठभूमि से आपका संबंध कैसे बना हुआ है?
मेरे पिताजी 1965 में मेरठ से ब्रिटेन आए थे मेडिकल की पढ़ाई करने, लेकिन उनका अपनी जन्मभूमि से रिश्ता अटूट रहा और ये मुझमें उनसे ही आया। मेरी दो बहनें हैं, उनका इतना जुड़ाव भारत से नहीं है। लेकिन मैं भारत जाती हूं तो हमेशा कैमरा लेकर जाती रही हूं। कैमरा मेरे लिए एक माध्यम है जिसकी मदद से मैं भारत को गहराई से समझ सकती हूं। मेरी सारी कहानियां भारत के बारे में ही रही हैं। मैंने गैरसरकारी संगठनों में लंबे समय तक काम किया है। गांवों में, छोटे शहरों में जाकर शोध किया है।
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फिल्म- संतोष
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर तो आप ‘अमर उजाला’ को बहुत अच्छे से जानती होंगी क्योंकि आप मेरठ से हैं और यहां आती जाती रहती हैं..
हां, मुझे हिंदी सिखाने में ‘अमर उजाला’ का योगदान रहा है। मैं अब भी पढ़ती हूं हिंदी, बहुत धीरे धीरे। ‘संतोष’ लिखते समय मुझे लगा कि दुनिया ही नहीं भारत के भी महानगरों के तमाम लोग होंगे जिन्होंने भारत का ये रूप देखा ही नहीं है। जिन जगहों में मैं घूमी हूं, उसका अनुभव ही नहीं होगा उन्हें। मेरी पृष्ठभूमि डॉक्यूमेंट्री की है। उसे बनाने के लिए हम बहुत रिसर्च करते हैं। अपनी इस फिल्म के लिए मेरा तरीका भी वैसा ही है। मुझे इस बात के लिए मुतमईन होना ही था कि जो मैं कहने जा रही हूं, वह ठीक है और मैंने इसे खुद देखा है। इस फिल्म की रिसर्च मैंने खुद की है और इसमें मुझे 10 साल लगे हैं।
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फिल्म- संतोष
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म में गाजियाबाद को गाजिलियाबाद, मेरठ को नेहरट या उत्तर प्रदेश को चिराग प्रदेश के रूप में दिखाने की कोई खास वजह?
मैं बेकार की चीजों की वजह से अनावश्यक आकर्षण नहीं चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी कि फिल्म की विषय वस्तु की बजाय लोग इसके स्थानों पर बहस करने लगें। मैंने एक कहानी उस समाज के लिए कही है जिसमें अब भी जातिवाद, इस्लाम से डर, हिंसा, भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा मौजूद है। और, ये सब जगह है। पूरी दुनिया में हैं। भ्रष्ट पुलिस सिर्फ भारत की समस्या नहीं है।
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