"जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे...", ये गीत है हिंदी सिनेमा के पहले प्लेबैक सिंगर कुंदन लाल सहगल के। कुंदन ना सिर्फ पहले प्लेबैक सिंगर कहे जाते हैं बल्कि ‘देवदास’ (1936) जैसी चंद फिल्मों में उम्दा अभिनय के लिए उनके प्रशंसक उन्हें हिंदी सिने जगत का पहला सुपरस्टार भी मानते हैं। कुंदन अपने गानों के साथ-साथ अपनी दरियादिली और शराब पीने की लत के लिए भी मशहूर थे। कहा जाता है कि वह बिना शराब पीए गाना नहीं गाते थे। गायक अपनी उदारता के लिए भी मशहूर थे, वह दिल खोलकर जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। उन्हें संगीत की दुनिया का कुंदन (सोना) कहा जाता था। आज उनकी पुण्यतिथि है। आइए इस मौके पर जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातों को…
कुंदन सहगल का शुरुआती जीवन
के एल सहगल या कुंदन सहगल का जन्म 11 अप्रैल 1904 को जम्मू में हुआ था। उनके पिता अमरचंद सहगल जम्मू और कश्मीर के राजा की अदालत में तहसीलदार थे। उनकी मां केसरबाई सहगल एक धार्मिक हिंदू महिला थीं, जिन्हे संगीत का बहुत शौक था। वह अपने बेटे को धार्मिक कार्यों में लेकर जाया करती थी, जहां शास्त्रीय भारतीय संगीत की पारंपरिक शैली में भजन, कीर्तन और शब्द गाए जाते थे। सहगल ने बचपन में जम्मू की रामलीला में एक सीता की भूमिका भी निभाई थी। स्कूली शिक्षा के बाद सहगल ने रेलवे टाइमकीपर के रूप में काम शुरू किया। बाद में, उन्होंने रेमिंगटन टाइपराइटर कंपनी के लिए टाइपराइटर सेल्समैन के रूप में काम किया और भारत के अलग-अलग जगहों पर घूमने का अवसर मिला।
आवाज खोने के डर से महीनों नहीं कि किसी से बात
के एल सहगल ने अपना पहला गीत 12 साल की उम्र में जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह के दरबार में गाया था। 13 साल की उम्र में जब उनकी आवाज में बदलाव आने लगा तो उन्हें अपनी आवाज बदलने और खोने का डर सताने लगा, जिसके बाद उन्होंने कई दिनों तक किसी बात ही नहीं की। उनकी इस हरकत से घरवाले परेशान रहने लगे और कहा जाता है कि उन्हें एक संत के पास ले गए, जिन्होंने उन्हें एक मंत्र दो साल तक उच्चारण करने के लिए कहा, जिसके बाद उनकी आवाज ठीक हो गई।
कैसे हुई फिल्म जगत में एंट्री?
सहगल शुरुआती दौर में सिर्फ शौक के लिए गाते थे, अंत में उनके जीवन में केवल संगीत रह गया। उनकी नौकरी भी छूट गई। धीरे-धीरे लोगों को उनका गीत पसंद आने लगा। कोलकाता में उन्हें गाने और एक्टिंग के ऑफर मिलने लगे थे। इस दौरान उनकी मुलाकात सिंगर हरिचंद बाली से हुई, उन्होंने सहगल की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्रोड्यूसर बी.एन. सरकार से मिलवाया। बी.एन सरकार ने सहगल की नौकरी कोलकाता में ही फिल्म स्टूडियो न्यू थिएटर में 200 रुपए के की तनख्वाह पर लगवा दी।
‘देवदास’ की सफलता ने बनाया सुपरस्टार
इस बीच सहगल के कुछ पंजाब गानों को इंडियन ग्रामोफोन कंपनी ने रिकॉर्ड किया। इन गानों के बाद वह पॉपुलर होने लगे। साल 1932 में फिल्म ‘मोहब्बत के आंसू’ से उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। इस साल उन्होंने दो और फिल्मों ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिंदा लाश’ में भी अभिय किया। हालांकि, ये तीनों फिल्में ही फ्लॉप हो गई थी। साल 1933 में फिल्म ‘यहूदी की लड़की’ रिलीज हुई। इस फिल्म में उन्होंने अपना नाम के एल सहगल रखा। इससे पहले की फिल्मों में उनका नाम सहगल कश्मीरी था। साल 1935 में उनकी फिल्म ‘देवदास’ रिलीज हुई। इस फिल्म में उन्होंने ‘बालम आन बसो मोरे मन में’ और ‘दुख के अब दिन बीतत नाही’ गानों को अपनी आवाज दी, जो काफी मशहूर हुए। देवदास की सफलता के बाद उन्हें सुपरस्टार कहा जाने लगा।
कैसे बने पहले प्लैबैक सिंगर?
कहा जाता है कि एक दिन नितिन बोस पंकज मलिक से मिलने उनके घर पहुंचे, जहां वह नहाते हुए रेडियो पर चल रहे गाने के साथ सुर मिलाकर गा रहे थे। यह देखकर बोस को आइडिया आया कि वह फिल्मों में भी इस तरह कुछ कर सकते हैं। उनके सुझाव पर प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत हुई और सहगल बन गए हिंदी सिनेमा के पहले प्लेबैक सिंगर।
शराब की लत और दरियादिली के लिए थे मशहूर
सहगल अपने शराब पीने की लत के लिए भी बदनाम थे। कहा जाता है कि बिना पीए वह गाना नहीं गाते थे। एक बार शाहजहां फिल्म के लिए नौशाद ने उनसे बिना शराब पिए गवाया। सहगल ने गाना तो गा दिया, लेकिन दो बार शराब पीकर गाने की जिद करने लगे, जिसके बाद वही गाना उन्होंने फिर से शराब पीकर गाया। बीना पीए सहगल ज्यादा अच्छा गा रहे थे। के एल सहगल अपनी दरियादिली के लिए भी मशहूर थे। उनकी शराब की लत और लोगों को पैसे और कीमते तोहफे दे देन की वजह से उनकी सैलरी सीधे उनके घर जाती थी। एक बार की बात है, वह अपने घर लौट रहे थे और किसी काम की वजह से उन्होंने अपनी गाड़ी दादर के सर्कल पर रोक दी। तभी एक भिखारी उनके पास आया। उसके कपड़े फटे थे। यह देखकर सहगल ने पूछा क्या तुम्हें ठंड लग रही है। भिखारी ने बताया कि उसके पास कपड़े नहीं है। यह सुनकर वह बहुत भावुक हो गए और अपने ड्राइवर को कपड़े लाने के लिए घर भेज दिया। इसके बाद अपने सारे कपड़े उस भिखारी को दिए और खुद सर्कल पर बिना कपड़ों के अपने ड्राइवर का इंतजार करने लगे। के एल सहगल की फैन लता मंगेशकर भी थीं, वह बचपन से ही उनसे मिलना चाहती थीं, लेकिन वह कभी उनसे मिल नहीं पाईं। के एल सहगल ने 18 जनवरी 1947 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।