Web Series Review: आश्रम
जी5 के लिए बेहतरीन फिल्म ‘परीक्षा’ बनाने वाले प्रकाश झा फिर से उसी दलदल में उतर आए हैं, जिसमें फंसकर बतौर निर्देशक वह बड़े परदे पर अपना आकर्षण खो बैठे हैं। उनकी कहानियों ने जब भी स्टार के आकर्षण के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश की है, वह कामयाब नहीं हो पाए हैं, ‘आश्रम’ फिर एक बार ये बात साबित करती है। मुफ्त में दिखने वाली वेब सीरीज के नाम पर एमएक्स प्लेयर और अल्ट बालाजी पर सॉफ्ट पोर्न परोसा जाता है, यही इन दोनों ओटीटी की इमेज है। ऐसे ओटीटी पर बॉबी देओल ने अपनी सीरीज आने दी, ये उनकी मजबूरी हो सकती है। लेकिन, प्रकाश झा की पैसे को लेकर ऐसी कोई मजबूरी रही होगी, समझना मुश्किल है।
Aashram review: जरूरत से ज्यादा खींची गई कहानी ने निकाल दी बाबाजी की हवा, देखिए मिले कितने स्टार
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‘आश्रम’ के साथ यहां दिक्कत इसके एपीसोड की लंबाई के अलावा हर क्षेपक का अनावश्यक विस्तार भी है। ये कहानी एक स्वयंभू भगवान की है जिसे उसके भक्त बाबाजी के नाम से पहचानते हैं। वह अपना अतीत सबसे छिपाता है। दूसरों का भविष्य चमकाने का वादा करता है। बस अपना वर्तमान संभाल नहीं पाता। तमाम धूम धड़ाके के साथ प्रकाश झा अपना बाबा दर्शकों के सामने लेकर आते हैं और फिर एकदम से आठ साल पीछे चले जाते हैं। एक दलित की प्रतिभा पर एक ऊंची जाति भारी पड़ती है। जो हार गई वह पम्मी है। इम्तियाज अली की वेब सीरीज ‘शी’ में आपने इन्हें देखा है। उनकी मौजूदगी यह बताने के लिए काफी है कि आगे सीरीज में वह क्या करने वाली हैं, क्या दिखाने वाली हैं।
बाबाजी निराला काशीपुर वाला चमत्कारी है। चेहरे पर एक ओज सा बनाए रखता है। उसकी लीलाएं जितनी भक्तों के सामने हैं, उससे कहीं ज्यादा मारक, घातक और त्रासक परदे के पीछे हैं। वह मुस्कुराता रहता है। उसका खास चेला भोपे सबका काम लगाता रहता है। सीरीज का असली आकर्षण चंदन रॉय सान्याल की अदाकारी ही है। वह जब भी बॉबी देओल के साथ फ्रेम में दिखते हैं, इक्कीस साबित होते हैं। सीरीज देखते समय दिक्कत ये है कि ऐसे तमाम बाबाओं के खेल दर्शक पहले ही न्यूज चैनल पर होने वाले खुलासों में देख चुके हैं। नाम भले न्यूज चैनल हो लेकिन उनके क्राइम शोज अच्छे अच्छे नॉन फिक्शन शोज को मात देते हैं।
प्रकाश झा के सामने असली चुनौती दर्शकों को इन शोज को याद न आने देने की है। सीरीज में नौ एपीसोड हैं, हर एपीसोड एक घंटे का है। सारे एपीसोड बिंज वॉच करना अपने आप में दूसरी बड़ी चुनौती है। शुरुआत में वर्तमान दिखाकर जब कहानी फ्लैशबैक में जाती है तो एक एक चीज को समझाने की कोशिश इसके लेखक हबीब फैसल और कुलदीप रुहिल करते हैं। दोनों कथा कथन का वह असली सूत्र भूल जाते हैं कि अगर कोई बात बतानी पड़े तो फिर पटकथा की चुस्ती जाती रहती है। कुछ बातें तो वह बार-बार दोहराते हैं। सब कुछ दर्शकों को बोलकर बताया जा रहा है। किरदारों के संवाद संजय मासूम ने लिखे हैं और काफी चुटीले और असरकारक लिखे हैं।
‘आश्रम’ में जातिगत भेदभाव, जातिगत राजनीति, शक्तियों का खेल और उत्पीड़न सब वैसा ही है, देश के ज्यादातर राज्यों वाला। खुद को गरीबों का मसीहा मानने वाले और उसे खूब प्रचारित करने वालों का उद्देश्य क्या है, अब तक न समझ आया हो तो ये सीरीज देखकर फिर से समझा जा सकता है। बस पम्मी और उसके भाई का हृदय परिवर्तन किस वजह से हुआ ये बताने में सीरीज चूक जाती है। सीरीज की कहानी जैसे जैसे खुलती है, इसके किरदार फैलने लगते हैं।