आज शुरू से शुरू करते हैं और पहले ये देख लेते हैं कि साल 1977 में भारत में सोने का भाव क्या था? तब सोना था 486 रुपये तोला। एक तोला यानी करीब 10 ग्राम। अगर उस साल किसी के पास सवा सात करोड़ रुपये होते तो वह खरीद सकता था करीब एक लाख 49 हजार 177 तोला सोना। अब सोना का भाव है 40989 रुपये तोला और उतना ही तोला सोना आज खरीदना हो तो उसके लिए चाहिए होंगे करीब 611 करोड़ रुपये। यानी जितना बाहुबली 2 के हिंदी संस्करण ने भारत में कुल कमाई की उससे करीब सौ करोड़ रुपये ज्यादा।
बाइस्कोप: पहली नजर में अमिताभ को रिजेक्ट कर दिया था मनमोहन देसाई ने, फिल्म की रिलीज के दिन आया बुखार
खैर, हम लौटते हैं अपनी आज की बाइस्कोप की फिल्म अमर अकबर एंथनी की तरफ। ये फिल्म बन तो गई थी सन 1975 के ही आसपास। लेकिन, देश में कांग्रेस सरकार के समय उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जो इमरजेंसी लगाई तो इस तरह की सारी फिल्में खिसककर आ गई सन 77 में। सन 77 यानी वही साल जब देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। और, सन 77 यानी वह साल जब देश में मनमोहन देसाई की एक साथ चार फिल्मे रिलीज हुईं और चारों की चारों ब्लॉकबस्टर। ये चार फिल्मे थीं, परवरिश, धरम वीर, चाचा भतीजा और अमर अकबर एंथनी। इनमें से अमर अकबर एंथनी पहली फिल्म थी जिसमें अमिताभ बच्चन को उन्होंने निर्देशित किया।
फिल्म की कहानी इसके निर्देशक मनमोहन देसाई को उनकी पत्नी जीवनप्रभा ने सुझाई थी एक अखबार में छपी खबर देखकर। खबर ये थी कि एक शराबी व्यक्ति अपने तीन बच्चों को पार्क में छोड़कर चला गया। फिल्म वक्त में भी ऐसी कहानी लोगों को खूब पसंद आई थी और नासिर हुसैन की फिल्म यादों की बारात में धर्मेंद्र, तारिक और विजय अरोड़ा ने भी भाइयों के बिछड़ने की ऐसी ही एक कहानी मे धमाल मचा दिया था। वैसे तो मनमोहन देसाई ही खुद को मसाला फिल्मों का गॉडफादर मुंबइया सिनेमा में मानते रहे लेकिन सलीम जावेद की जोड़ी ये काम नासिर हुसैन की फिल्म यादों की बारात में चार साल पहले ही कर चुकी थी।
पढ़ें: बाइस्कोप: जानिए, क्या हुआ जब कैमरा ऑन होने से ठीक पहले बिग बी को मिली इस खास निर्देशक के निधन की खबर
अमर अकबर एंथनी बनने का किस्सा मैंने कहा था कि शुरू से पकड़ते हैं। तो आपको पहले बताते हैं वो किस्सा जब अमिताभ बच्चन और मनमोहन देसाई की पहली पहली मुलाकात हुई। लेखक सलीम खान की सिफारिश पर अमिताभ बच्चन को जंजीर मिल चुकी थी। जंजीर का एक ट्रायल खुद सलीम खान ने अपने पैसों से मशहूर निर्माता जी पी सिप्पी के लिए रखा, जिसे देखकर अमिताभ बच्चन को मिली थी फिल्म शोले। और सलीम खान ने ही एक दिन होटल में मनमोहन देसाई को बुलाकर उनकी मुलाकात इस दुबले पतले लेकिन लंबे नौजवान से कराई। मुलाकात बहुत अच्छी नहीं रही।
मनमोहन देसाई को अमिताभ बच्चन कुछ ज्यादा प्रभावित नहीं कर सके। मीटिंग खत्म हुई तो मनमोहन ने ताना मारा कि खामखां मेरा वक्त जाया किया। ये लड़का कुछ खास है नहीं। सलीम खान ने तब कहा था कि एक दिन तुम इसी आम से दिखने वाले लड़के को साइन करने जाया करोगे, अपनी खास फिल्में लेकर। जंजीर के सुपरहिट होने के बाद जब मनमोहन देसाई अमर अकबर एंथनी लेकर अमिताभ के पास गए तो उन्हें भी ये कहानी कुछ खास नहीं लगी थी। लैला मजनू की शूटिंग के दौरान मनमोहन देसाई ने ऋषि कपूर को फोन किया तो उन्होंने भी उनकी कहानी सुनकर फिल्म के लिए मना कर दिया था। विनोद खन्ना को बिना हीरोइन का अपना रोल कहानी के तब तक बने ड्राफ्ट में ठीक नहीं लगा तो वो फिल्म छोड़ने की धमकी तक देकर शबाना आजमी को इस फिल्म में अपनी हीरोइन बनाकर ले आए।
पढ़ें: बाइस्कोप: जब हेमा मालिनी को बंबई से माल्टा ले उड़े धर्मेंद्र और किया खुल्लम खुल्ला इश्क का इजहार
अमर अकबर एंथनी कहानी है तीन भाइयों की जो बचपन में बिछड़ जाते हैं और अलग अलग मजहबों को मानने वाले इंसानों के यहां पलते हैं। अमिताभ बच्चन तो आज तक इस फिल्म की हंसी उड़ाते हैं। लेकिन, अमर अकबर एंथनी चली तो अपनी सिर्फ एक वजह के चलते और वो था इसमें दिखी असली हिंदुस्तान की झलक। धर्मनिरपेक्षता की ये फिल्म अद्भुत मिसाल मानी जाती है। ऐसी फिल्में देखने वाले दर्शक अब भी हैं और तब भी ये फिल्म जब रिलीज हुई थी तो पूरे देश में तहलका मच गया था। हफ्तों तक ये फिल्म एक ही शहर के अलग अलग सिनेमाघरों में चलती रही। मुंबई के नौ सिनेमाघरों में इस फिल्म ने सिल्वरजुबली मनाई। और, ये इसके बावजूद कि मनमोहन देसाई इस फिल्म के बनाने के दौरान इसे बंद करने तक की सोचने लगे थे। जिस दिन फिल्म रिलीज हुई उन्हें बुखार चढ़ आया और ये बुखार तभी उतरा जब लोगों ने बताया कि सिनेमाघरों के बार हाउसफुल के बोर्ड टंगने लगे हैं।
फिल्म जब बनकर तैयार हुई तो विनोद खन्ना इस बात को लेकर बिदक गए कि फिल्म में उनका रोल लंबा नहीं। निर्देशक ने उन्हें ये कहकर समझाया कि भई फिल्म परवरिश में पल़ड़ा तुम्हारी तरफ झुका रहा तो इस बार तुम सब्र कर लो। बड़ी मुश्किल से माने थे विनोद खन्ना। फिल्म में तीन बेटों का खून सीधे निकलकर मां को चढ़ने और गर्भवती होने की जांच नब्ज देखकर करने के दृश्य फिल्मों में अतार्किकता की हदें लांघ गए लेकिन जनता को ये सब भी खूब पसंद आया। जनता ने इस पर भी एतराज न जताया कि फिल्म में नीतू सिंह से पहली बार मिलने पर ऋषि कपूर उन्हें उनके किरदार के नाम सलमा से नहीं बल्कि नीतू कहकर ही बुलाते हैं।
पढ़ें: बाइस्कोप: शादी के चार महीने बाद निकली नीतू सिंह की ये ‘बारात’, निर्देशक ने छोटा किया रोमांटिक ट्रैक
फिल्म की पटकथा लिखी प्रयाग राज ने। संडे के दिन सुबह सुबह वह गए थे मनमोहन देसाई से उनके फार्म हाउस की चाभी मांगने उनके घर ताकि छुट्टी वह परिवार के साथ वहां बिता सकें। लेकिन, प्रयागराज से मनमोहन ने चर्चा शुरू कर दी उस अखबार की खबर की जो उन्हें उनकी पत्नी जीवनप्रभा थमा गई थीं। दोनों ने फिल्म की कहानी पर बातचीत शुरू कर दी। बस चाय पकौड़ों के दौर चलते रहे। प्रयाग राज का लंच भी उस दिन वहीं हुआ और डिनर भी। लेकिन रात तक दोनों को ये समझ आ गया था कि इस कहानी पर फिल्म अच्छी बनाई जा सकती है।
अपने करियर की दिशा बदल देने वाली फिल्म अमर अकबर एंथनी से पहले मनमोहन देसाई ने राजकपूर के साथ छलिया, शम्मी कपूर के साथ ब्लफमास्टर, राजेश खन्ना के साथ सच्चा झूठा और रोटी, रणधीर कपूर के साथ रामपुर का लक्ष्मण और जीतेंद्र के साथ भाई हो तो ऐसा जैसी सुपरहिट फिल्में बनाईं थीं। लेकिन, कामयाबी का जो दौर उन्होंने अमर अकबर एंथनी के बाद देखा वैसा दौर प्रकाश मेहरा को छोड़ दूसरा कोई निर्देशक हिंदी सिनेमा में नहीं देख पाया। अमर अकबर एंथनी की सक्सेस पार्टी में मनमोहन देसाई ने अमिताभ बच्चन से कहा भी, ‘अब तुम मुझे छोड़कर चले जाओ तो पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला।’ अपनी बात पर वह आखिर तक कायम रहे। अमर अकबर एंथनी के बाद उन्होंने फिल्में बनाईं, सुहाग, नसीब, देशप्रेमी, कुली, मर्द और गंगा जमना सरस्वती और हर फिल्म में हीरो अमिताभ बच्चन ही रहे।
पढ़ें: बाइस्कोप: जानिए परवीन बाबी की जगह कैसे 'लावारिस' में आईं जीनत अमान, और राखी की होते होते बची छुट्टी