भारतीय सिनेमा में बायोपिक बनाने का चलन वैसे तो फिल्म ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ से माना जाता है लेकिन संगीतम श्रीनिवास राव की साल 1984 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘मयूरी’ ने इसे फिर से चलन में ला दिया। ये फिल्म सुपरहिट हुई तो निर्माता रामोजी राव ने इसे हिंदी में बनाने का फैसला कर लिया। दो साल बाद फिल्म ‘नाचे मयूरी’ रिलीज हुई और सुपरहिट रही। निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव का नाम उत्तर भारत में भी लोग जानने लगे थे और इसी बीच साल 1988 में एक ऐसी फिल्म की चर्चा हुई जिसमें कोई संवाद ही नहीं था। फिल्म का नाम था ‘पुष्पक विमाना’। फिल्म में जब संवाद ही नहीं तो इसकी भाषा भला क्या? लेकिन हिंदी पट्टी के वितरकों ने इसे ‘पुष्पक’ नाम से रिलीज किया। कमल हासन और अमला के साथ टीनू आनंद के अभिनय ने इस फिल्म से निर्देशकसंगीत श्रीविनास राव को घर घर चर्चित कर दिया और इनकी कमल हासन के साथ अगली फिल्म ‘अपूर्व सहोदारगल’ ने तो कमाल ही कर दिया। कमल हासन ने फिल्म एक पूरा और एक आधा रोल किया। आधा मतलब कुछ कुछ फिल्म ‘जीरो’ में शाहरुख खान के किरदार बउआ सिंह जैसा। हिंदी में ये फिल्म ‘अप्पू राजा’ के नाम से रिलीज हुई और सुपरहिट हुई। ये बात है साल 1990 की और तब तक हिंदी सिनेमा में अपनी पहली ही फिल्म ‘लव स्टोरी’ से सुपरस्टार बने कुमार गौरव के सारे विकल्प सिनेमा में बने रहने के आजमाए जा चुके थे। संगीतम श्रीनिवास राव को कुमार गौरव का करियर बचाने का जिम्मा सौंपा गया फिल्म ‘फूल’ में, इस बार बाइस्कोप में चर्चा इसी फिल्म की।
Bioscope S2: कुमार गौरव ने ठुकराया राज कपूर की बेटी का रिश्ता, माधुरी ने खिलाया करियर का आखिरी ‘फूल’
संगीतम श्रीनिवास राव पर दांव
अभिनेता राजेंद्र कुमार ने आखिरी दांव अपने बेटे कुमार गौरव पर लगाया और एलान किया एक फिल्म का जिसमें उस वक्त की नंबर वन हीरोइन माधुरी दीक्षित को लिया गया। निर्देशक लाए गए संगीतम श्रीनिवास राव। राजेंद्र कुमार ये मानकर चले कि जो निर्देशक कमल हासन को तमिल सिनेमा से निकालकर पूरी दुनिया में सुपरस्टार बना सकता है, वह जरूर उनके बेटे का कुछ तो कल्याण करेगा। आमतौर पर हिंदी सिनेमा के सितारे दक्षिण भारत के फिल्मकारों से मुंहमांगी रकम पाते रहे हैं, ये शायद पहला मौका था जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्ममेकर ने मुंबई के फिल्म निर्माता से मुंहमांगी रकम फिल्म निर्देशित करने के लिए वसूल की। और, ये फिल्म बनी भी तो सिर्फ राजेंद्र कुमार की साख के चलते। राजेंद्र कुमार को जिन्होंने करीब से जाना है, वे मानते हैं कि हिंदी सिनेमा के चंद बेहद शरीफ लोगों में उनकी गिनती की जा सकती है। लोकप्रियता में वह जुबली कुमार कहलाए। सायरा बानो उनकी लंबे समय तक दीवानी रहीं। ये दीवानापन तोड़ने के लिए ही दिलीप कुमार बीच में लाए गए और वह सायरा बानो को इश्क का असली मतलब समझाते समझाते खुद उनके इश्क में गिरफ्तार हो गए।
जलवा जुबली कुमार का
वह जमाना ऐसा था जब उनकी आधा आधा दर्जन फिल्में एक साथ तमाम शहरों के सिनेमाघरों में लगी होतीं और सब कम से कम 25 हफ्ते (सिल्वर जुबली) इन सिनेमाघरों मे चलती रहतीं। ‘धूल का फूल’ से शुरू हुआ सिल्वर जुबली फिल्मों का ये सिलसिला ‘दिल एक मंदिर’, ‘मेरे महबूब’, ‘संगम’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आरजू’, ‘सूरज’, ‘झुक गया आसमान’, ‘तलाश’ और ‘गंवार’ जैसी फिल्मों तक चलता रहा। लेकिन, शायद ही आपको पता हो कि जो सितारा जनता के बीच जुबली कुमार के नाम से मशहूर हुआ वह कभी पुरस्कारों की सेटिंग में नहीं पड़ा और न ही उसने कभी किसी पुरस्कार देने वाली पत्रिका के संपादक की खुशामद ही इस काम के लिए की। राजेंद्र कुमार कहते थे, “अंग्रेजी बोलने वालों से मिली तारीफ से कुछ नहीं होता। तारीफ उससे मिलनी जरूरी है जो दिन में चंद रुपये कमाकर भी शाम को टिकट लेकर मेरी फिल्म देखता है।” राजेंद्र कुमार ने कभी अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों की तारीफ को ही अपनी काबिलियत का पैमाना भी नहीं माना।
वचन निभाने को माधुरी ने की फिल्म
राजेंद्र कुमार ने जब संगीतम श्रीनिवास राव के साथ अपने बेटे का करियर बचाने के लिए फिल्म ‘फूल’ बनाने का एलान किया तो लोगों को समझ नहीं आया कि ये प्रोजेक्ट बनेगा कैसे। लेकिन कम लोगों को ही ये पता था कि ये राजेंद्र कुमार ही थे जिन्होंने माधुरी की काबिलियत को ‘तेजाब’ की रिलीज से पहले ही पहचान लिया था और उनको अपनी एक फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट भी दे आए थे। राजेंद्र कुमार की इस दरियादिली ने अपना रंग दिखाया और उनके फोन करने पर माधुरी दीक्षित को साल 1987 की बात याद रही और उन्होंने उनकी फिल्म ‘फूल’ में बिना किसी हिचक के काम भी किया। माधुरी चाहतीं तो तब साइनिंग अमाउंट लौटाकर इस फिल्म के लिए मना भी कर सकती थीं, लेकिन माधुरी को हिंदी सिनेमा में दिल से मजबूत और जुबान से पक्की कलाकार माना जाता है। ये इस घटना ने एक बार फिर साबित भी किया। वैसे, माधुरी और कुमार गौरव को एक और फिल्म ‘नाराज़’ के लिए भी साइन किया गया था लेकिन वह फिल्म बनी नहीं।
समधी सुनील दत्त का मिला साथ
तो किसी तरह फिल्म ‘फूल’ शुरू हुई। प्रोड्यूसर तो खुद राजेंद्र कुमार थे ही। इसके बाद डायरेक्टर हो गया, हीरो हो गया, हीरोइन भी हो गई। अब जरूरत आन पड़ी कुछ ऐसे दमदार कलाकारों की जिनके नाम से ये फिल्म बेचने में आसानी हो। सबसे पहले तो राजेंद्र कुमार ने खुद तय किया कि वह इस फिल्म में काम करेंगे। बड़े परदे पर ये उनकी आखिरी झलक रही। और, उनके साथ फिल्म में दिखे सुनील दत्त। सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार की दोस्ती फिल्म ‘मदर इंडिया’ के जमाने से रही है। फिल्म ‘फूल’ में दोनों ‘मदर इंडिया’ (1957) के बाद ही एक साथ नजर आए और तब तक दोनों समधी भी बन चुके थे। कुमार गौरव ने सुनील दत्त की बेटी नम्रता से शादी की है। इससे पहले कुमार गौरव का नाम उनकी पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ की हीरोइन विजेयता पंडित से भी जुड़ चुका था लेकिन राजेंद्र कुमार ने इस रिश्ते से साफ इनकार कर दिया। कुमार गौरव की मंगनी दरअसल शो मैन राज कपूर की बेटी रीमा से सबसे पहले हुई थी लेकिन कुमार गौरव ने बाद में ये शादी करने से इंकार कर दिया था। फिल्म ‘फूल’ की कहानी भी यही है जिसमें दो दोस्त अपनी संतानों की शादी करना चाहते हैं लेकिन बाद में एक दोस्त बड़ा बिजनेसमैन बन जाता है और शादी से इंकार कर देता है।