Movie Review: कमांडो 3
आयुष्मान खुराना की फिल्म आर्टिकल 15 से छह साल पहले आर्टिकल 21 पर राजीव खंडेलवाल के साथ फिल्म बनाने वाले निर्देशक आदित्य दत्त की हिंदी सिनेमा में बोहनी 14 साल पुरानी है। इमरान हाशमी को सुपरस्टार बनाने वाले निर्देशको में उनकी गिनती भी होती है और गिनती उनकी इस बात के लिए भी होती है कि उन्होंने सनी लिओनी की बायोपिक बनाई। आदित्य के पास सिनेमाई समझ का विशाल कैनवस है लेकिन उनके विजन में दिक्कत वैसी ही है जैसी फिल्म कमांडो 3 में पहलवानों के लिए सिले गए ‘डिजाइनर लंगोटों’ में हैं।
Commando 3 Review: विद्युत के एक्शन और अदा की अदाकारी ने इस तरह बचाई लाज, देखिए मिले कितने स्टार
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ओटीटी पर काम कर करके अपनी असली चमक खो चुके ओवरएक्टिंग के शिकार गुलशन देवैया और दो दो हीरोइनों के बावजूद एक भी गाने पर अपने रूमानी एहसास न दिखाने वाले विद्युत जामवाल फिल्म कमांडो 3 के दो विरोधी सिरे हैं। पहला ऐसा आतंकवादी बना है जिसे अपने मासूम बच्चे को लाइव मर्डर दिखाने में सुख मिलता है। दूसरा ऐसा देशभक्त बना जिसके आगे अयोध्या मसले में समझौता फॉर्मूला निकालने की कोशिश में लगे रहे श्री श्री रविशंकर भी फेल हैं। भारत में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर जैसी तबाही मचाने की तैयारी में लगे आतंकवादी बुराक अंसारी को पकड़ने का ये मिशन लंदन की पृष्ठभूमि में है।
विद्युत जामवाल नई सदी के सनी देओल हैं। उनका हाथ ढाई किलो से कहीं ज्यादा वजनी है। उनके एक्शन के सेट पैटर्न हैं। कार की खिड़की के बीच से निकल जाना या हवा में कलाबाजियां मारकर दुश्मन को चित कर देना, ये सब कमांडो की पिछली फिल्मों की तरह ही है। लेकिन, फिल्म का पैसा वसूल सीन है उनकी दो चाकूबाजों से भिड़ंत। पूरा एक्शन सीन विद्युत ने खुद किया है और इस सीन से नजर हटा पाना मुश्किल है। विद्युत ने अपने एक्शन को इस फिल्म में काफी निखारा है। संवाद अदायगी भी पिछली फिल्मों से बेहतर है। उनकी परदे पर मौजूदगी कहानी के विस्तार में कमी को भुला देती है।
कमांडो 3 की कहानी दूसरे पैराग्राम में आप पढ़ ही चुके हैं। पटकथा भी इस फिल्म की बस उतनी ही है। बस हर लाइन के बाद पांच मिनट का एक्शन सीन जोड़ते जाइए औऱ दो घंटे और 13 मिनट की फिल्म तैयार। आदित्य दत्त ने आशिक बनाया आपने जैसी म्यूजिकल फिल्म से अपना करियर शुरू किया और एक बिल्कुल नॉन म्यूजिकल फिल्म बनाने की इस कोशिश में चौंकाया है। हां, अगर पटकथा थोड़ी चुस्त और किरदारों की थोड़ी सी ही सही पर तार्किक पृष्ठभूमि बताती चलती तो फिल्म और असरदार हो सकती थी। हिंदू-मुस्लिम एकता का राग भी अगर पंचम स्वर के बजाय थोड़ा हल्के में गाया जाता तो फिल्म बेहतर बनती।
फिल्म तकनीकी पक्ष से काफी कमजोर है। मार्क हैमिल्टन ने फिल्म किस कैमरे पर शूट की ये तो वही जाने, लेकिन जुहू, पीवीआर के बड़े परदे पर देखते समय फिल्म खराब लगती है। फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स भी बहुत सतही किस्म के हैं। डोगरा का बुराक अंसारी को हेलीकॉप्टर से लेकर निकलना और पानी के जहाज तक पहुंचने वाला पूरा सीन स्पेशल इफेक्ट्स से रचा गया है और इस पूरे सीक्वेंस में विजुअल इफेक्ट्स की सारी कमजोरी जाहिर हो जाती है।