Movie Review: दरबार
मुंबई एक ऐसा शहर है जिसकी जरूरत हर उस इंसान को पड़ती ही है जो ग्लैमर की दुनिया में अपना नाम चमकाना चाहता है। रजनीकांत की नई फिल्म मुंबई एक ऐसे दबंग पुलिस अफसर की कहानी है जो इस शहर को नशीली दवाओं से मुक्त कराना चाहता है। आपको लगेगा कि ऐसी कहानियां तो आप सौ मर्तबा देख चुके हैं, लेकिन घिस चुके किस्सों को अपनी कभी ना घिसने वाली चमक से रौबदार बना देना ही रजनीकांत का स्टाइल है। ऐसा रजनीकांत के फैंस कितनी फिल्मों तक बर्दाश्त करेंगे, असली परीक्षा उनकी फिल्मों की अब इसी कसौटी पर होने लगी है।
Darbar Review: मुरुगादॉस की घिसी पिटी कहानी ने नहीं सजने दिया दरबार, देखिए मिले इतने स्टार
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रजनीकांत भारतीय सिनेमा का मिथ हैं। पिछले दशक में रिलीज हुईं उनकी नौ फिल्मों में से तमाम हिंदी में भी डब होकर रिलीज हुईं लेकिन पेट्टा, 2.0 और कबाली में हिंदी सिनेमा के दर्शक अपने हाथ जला चुके हैं। अब बारी दरबार की है। दरबार सिनेमा के लिहाज से कुछ ज्यादा नहीं परोसती। रजनीकांत के कंधे पर एक कमजोर कहानी लादकर मुरुगादॉस ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है। रजनीकांत भी कभी जुल्फों को खास अदा में झटककर, पिस्तौल को नचाकर और कपड़ों को पीछे झटककर ऐसी फिल्मों में आगे बढ़ जाते हैं। ये रजनीकांत का ही कमाल है कि एक औसत से कमतर फिल्म को लेकर भी उनके फैंस दीवाने बने रहते हैं।
मुरुगादॉस के सिनेमा की अपनी एक खास शैली है। वह कभी एक समय में रुककर कहानी नहीं बताते। यहां भी फ्लैशबैक में चलती कहानी बस फिल्म खत्म होने से थोड़ा पहले वर्तमान में आती है। आदित्य मुंबई पुलिस का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट है। भाई लोगों के लिए वह काल बनकर आता है। लेकिन, अन्ना का ही कमाल है कि वह डॉन बनकर रजनीकांत को चुनौती देने का दम भर सकते हैं। वैसे देखा जाए तो रजनीकांत की फिल्मों का करिश्मा इधर कुछ साल से इसलिए भी कम हो रहा है क्योंकि उनकी फिल्मों के विलेन उनके मिथ का मुकाबला करने लायक नहीं रह गए हैं।
दक्षिण की फिल्मों को उत्तर तक पहुंचाने के लिए मुंबई के हाशिये पर पड़े कलाकारों को विलेन बनाकर पेश करने का मुकेश ऋषि से शुरू हुआ सिलसिला सोनू सूद, विवेक ओबेरॉय, अक्षय कुमार से होता हुआ सुनील शेट्टी तक आया है। उत्तर, दक्षिण के इस संगम की धारा त्रिवेणी में बदल सकती है अगर इनकी कहानियां भी उत्तर भारतीय दर्शकों की पसंद के हिसाब से रची गढ़ी जाए।
फिल्म दरबार की पटकथा खुद मुरुगादॉस ने लिखी है तो घिसी पिटी घटनाओं को फिर से दोहराने का इल्जाम उन्हीं के सिर बनता है। फिल्म दरबार की कहानी ऐसी है कि पड़ोस की सीट पर बैठा मसाला फिल्मों का शौकीन दर्शक भी पहले से ही बताने लगता है, अब क्या होने वाला है। गजनी, स्टालिन और थुपक्की जैसी फिल्में बनाने वाले मुरुगादॉस के लिए ये खतरे की घंटी से कम नहीं है। कहानी में किस्सों की अनसुनी करवटें उनकी फिल्मों की शैली रही है लेकिन दरबार? रजनीकांत के हिंदी पट्टी के प्रशंसकों के लिए दो घंटे 30 मिनट की ये फिल्म कहीं कहीं बहुत बोर करती है।
फिल्म दरबार को संतोष सिवन औऱ ए श्रीकर प्रसाद जैसे तकनीशियनों का मजबूत सहारा मिला है। संतोष की सिनेमैटोग्राफी तो खैर लाजवाब होती है और प्रसाद की एडिटिंग का भी कोई जोड़ नहीं है लेकिन ये दोनों भी क्या करेंगे अगर फिल्म के किरदार प्रतीक बब्बर जैसे हों, जिन्हें पता ही नहीं कि निर्देशक एक्शन बोले तो कहां देखना है और क्या करना है? सुनील शेट्टी अपनी सेकंड इनिंग्स में भी ज्यादा कुछ बदल नहीं पाए हैं। उनकी मौजूदगी परदे पर किसी तरह का तिलिस्म नहीं पैदा कर पाती है। अमर उजाला मूवी रिव्यू में फिल्म दरबार को मिलते हैं दो स्टार।
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