फिल्म: डायग्नॉसिस ऑफ लव
जी5 (ZEE5) ने फिल्मावलियों के कारोबार में थोड़ी देर से एंट्री भले ली हो लेकिन अपनी पहली ही फिल्मावली ‘फॉरबिडेन लव’ में इस ओटीटी ने कथन, कथ्य और कथा का जो स्तर बनाया है, वह इसके पहले रिलीज हो चुकीं फिल्मावलियों ‘शॉर्ट्स’, ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘घोस्ट स्टोरीज’ से कई दर्जे ऊपर है। इस फिल्मावली (फिल्म एंथॉलजी) की पहली दो फिल्मों ‘अनामिका’ और ‘अरेंज्ड मैरिज’ ने डिजिटल मनोरंजन की दुनिया में काफी हलचल मचाई है और अब इसकी बाकी दो फिल्में भी दर्शकों के सामने हैं।
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फिल्मावली ‘फॉरबिडेन लव’ की जो दो नई फिल्में गुरुवार को देसी ओटीटी जी5 पर रिलीज हुईं, उनमें से पहली है महेश मांजरेकर निर्देशित ‘डायग्नॉसिस ऑफ लव’। ये फिल्म ढलती उम्र में बढ़ती असुरक्षा की चढ़ती उमंगों की कहानी है। सुधा गोवा में एक अस्पताल चलाती है और शादी उसकी हुई है वैभव से। कारोबारी महिला सुधा जितने सधे अंदाज में दफ्तर के फैसले लेती है, उतने ही खुले विचारों से वह अपनी टीम में डॉ. हर्ष का स्वागत करती है। हर्ष का अपना एक अतीत है लेकिन उसमें सुधा को नहीं झांकना है, हां, सुधा के पति यानी वैभव को सुधा के वर्तमान में जरूर झांकना है जिसके लिए वह मदद लेता है आदित्य नाम के पुलिस वाले की। कहानी यहीं से एक अनदेखी करवट ले लेती है।
महेश मांजरेकर ने अपने ही निर्देशन में बनी ‘डायग्नॉसिस ऑफ लव’ में अभिनय भी किया है लेकिन, यहां वह सिर्फ पतंग का कन्ना बने हैं, खुली हवा में उड़ने का मौका उन्होंने राइमा सेन को दिया है। राइमा की देहयष्टि उन्हें खजुराहो के मंदिरों की किसी नर्तकी सा सौंदर्य तो देती ही है, उनकी काया की कमनीयता पुरुष के भीतर हमेशा सोते रहने वाले कामदेव को जगाने की भी भरपूर स्निग्धता लिए हुए है। प्रेम के कलरव में संभोग का स्पंदन ही महेश मांजरेकर के निर्देशन की असली विजय है। राइमा का उन्हें अच्छा साथ मिला है और उनके जोड़ीदार वैभव तत्वावादी ने यहां फूल को खिलाने वाले किसी भंवरे सा उनका साथ दिया है।
फिल्म ‘डायग्नॉसिस ऑफ लव’ आप यहां देख सकते हैं
फिल्मावली ‘फॉरबिडेन लव’ की दूसरी कहानी खेल के नियम लिखने के बारे में है, ‘रूल्स ऑफ द गेम’। ये खेल जीवन का है। जीवन को गति देने वाली सांसों का है और सांसों को कंपन देने वाले उन एहसासों का है, जिनको महसूस करने के लिए दुनिया दीवानी है। निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने इस फिल्म में निर्देशन की उस शैली का प्रयोग किया है जिसमें कलाकारों को कहानी का एक दायरा मिला होता है, पटकथा की कुछ रेखाएं खिंची होती हैं, लेकिन इसके किरदारों को आकार कलाकारों को खुद देना होता है, कैमरा बस उनके भावबिंदु मिलाता रहता है।
अनिरुद्ध रॉय चौधरी निर्देशित ‘रूल्स ऑफ द गेम’ की कहानी रोचक है। प्रिया और गौरव का अपना एक संसार है। इन्होंने अपने एहसासों की, स्पर्शों की एक अलग दुनिया बसाई है। प्रिया प्रेम में पूरी तरह पगी युवती है। गौरव का गान भी कम नहीं है। पर दोनों ने अपने अपने कामों में व्यस्त होकर वैवाहिक पथ पर उगी घास पर पड़ी ओस की बूंदों का सुख खो दिया है। प्रिया की एक दोस्त भी है कहानी में, निशा। प्रिया जिंदगी को देखकर सीखती है। ऐसा ही वह कुछ गलियों में देखती है जिसे वह अपने बिस्तर पर आजमाना चाहती है। गौरव को भी ये ठीक ही लगता है और ऐसा लगता है तो लगने में कोई बुराई नहीं है। संभोग से पहले के समय की महत्ता समझने वाले दंपतियों की तरह वह ‘रोल प्ले’ करते हैं। और, फिल्म का असली खेल भी यहीं से समझ आना शुरू होता है।