सिर्फ तीन साल में 15 बैक टू बैक हिट फिल्में देने वाले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने एक रिकॉर्ड अपने करियर की सेकेंड इनिंग्स में साल 1985 में भी बनाया। इस साल राजेश खन्ना की अकेले एक साल में 13 फिल्में रिलीज हुईं। राजेश खन्ना की इससे पहले साल 1971 और 1972 में 10-10 फिल्में रिलीज हुई थीं। उन्होंने अपने करियर की शुरूआत में ही जो कामयाबी पाई उसने उनका करियर आगे भी दो दशकों तक संभाले रखा। यूं तो राजेश खन्ना ने हिंदी सिनेमा में श्रीदेवी और जया प्रदा के आगमन के बाद तमाम फिल्मों में फूहड़ कॉमेडी की है, लेकिन उनके करियर के स्वर्णिम दौर की फिल्में अगर याद की जाएं तो उनमें ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘बावर्ची’ और ए भीमसिंह निर्देशित फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ का नाम सबसे पहले आता है।
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नंदा के साथ तीसरी फिल्म
15 सितंबर 1972 को रिलीज हुई फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ कमाल के ड्रामा वाली फिल्म है। फिल्म में राजेश खन्ना के साथ नंदा, ओम प्रकाश और जयश्री टी जैसे सितारे अहम भूमिकाओं में हैं और फिल्म का संगीत दिया था कल्याणजी आनंद जी ने। फिल्म की कामयाबी का ही असर रहा कि बाद में इस फिल्म का कन्नड़ में भी ‘अनुकूलाक्कूब्बा गांडा’ के नाम से रीमेक बना। राजेश खन्ना और नंदा की जोड़ी ने इससे पहले ‘द ट्रेन’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी चर्चित फिल्मों में भी काम किया। ये दोनो की जोड़ी की तीसरी फिल्म थी। प्रसिद्ध लेखक मधुसूदन कालेलकर की कहानी पर फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ की पटकथा अख्तर उल इमान ने लिखी थी। फिल्म में राजेश खन्ना और नंदा पर फिल्माया गया छेड़छाड़ का ये गाना साल 1972 के सुपरहिट गानों में शामिल रहा है। किशोर कुमार की आवाज में जब राजेश खन्ना लिप सिंक करते हुए बोलते हैं कि ‘फिर कौन सी जगह है खाली और मतवाली में कहां रहूंगा..’ तो यूं लगता है कि किशोर कुमार की आवाज बस राजेश खन्ना के लिए ही बनी थी।
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सिनेमा के ‘भीम’
फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ के निर्देशक हैं ए भीम सिंह। दिलीप कुमार के साथ ‘आदमी’ और ‘गोपी’ जैसी फिल्में बनाने वाले निर्देशक ए भीमसिंह के सिनेमा के बारे में हिंदी में कम ही लिखा गया है। ऐसा निर्देशक भारतीय सिनेमा में दूसरा मिलना मुश्किल है। वह थोड़ा लेट स्टार्ट हुए अपने करियर में लेकिन 30 साल में अपनी पहली फिल्म निर्देशित करने वाले भीम सिंह ने अगले 24 साल में 76 फिल्में बना डाली, इनमें शामिल हैं, 34 तमिल, 18 हिंदी, आठ तेलुगू, पांच मलयालम और एक कन्नड़ फिल्म। ए भीमसिंह ‘गोपी’ बनाने के अगले तीन साल में विनोद खन्ना और संजय खान के साथ ‘सब का साथी’, राजेश खन्ना के साथ ‘मालिक’ और ‘जोरू का गुलाम’ तथा धर्मेंद्र के साथ ‘लोफर’ जैसी चर्चित फिल्में बनाईं। ‘मालिक’ और ‘जोरू का गुलाम’ दोनों फिल्में एक ही साल 1972 में रिलीज हुईं।
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गुलाम जोरू का या उसके झूठ का!
‘जोरू का गुलाम’ कहानी है एक अत्यंत धनवान परिवार की बेटी कल्पना की। कल्पना के माता पिता हमेशा इस बात से परेशान रहते हैं कि कहीं वह किसी गलत आदमी की सोहबत में न पड़ जाए। वह अपने चाचा के शहर में पढ़ने आती है और यहां उसकी मुलाकात एक काबिल आर्टिस्ट राजेश से होती है। दोनों में प्यार होता है और दोनों शादी करने का फैसला करते हैं। कल्पना के पिता को लगता है कि राजेश की नजर उसकी दौलत पर है। कल्पना अपने पिता की इस बात का बुरा मान जाती है और राजेश के साथ रहने के लिए अपना घर छोड़ देती है। कल्पना के पिता उसे अपनी सारी जायदाद से बेदखल कर देते हैं। उधर अपनी मां के लगातार संपर्क बनाए रखने वाली कल्पना मां बनती है। अपने नाना बनने की खबर पाते ही सेठजी का गुस्सा काफूर हो जाता है और वह अपनी नातिन से मिलने का एलान कर देते हैं। अब कल्पना क्या करे? उसने तो अपनी मां की नजरों में अपने खुशहाल होने और ऐशोआराम की जिंदगी जीने की तस्वीर बना रखी है। एक झूठ को छुपाने के लिए उसे सौ और झूठ बोलने होते हैं और मामला लगातार जो उलझता जाता है, उसी से इस फिल्म का सहज हास्य उभरता है।
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कहानी में टीना का ट्विस्ट
फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ में कल्पना की दोस्त टीना का भी बेहद अहम किरदार है, और ये किरदार किया पूनम चंदीरमानी ने जो अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी बनने के बाद बनीं, पूनम सिन्हा। पूनम को अदाकारी का पहला मौका हिंदी सिनेमा में निर्देशक रविकांत नगाइच ने 1969 में रिलीज हुई फिल्म ‘जिगरी दोस्त’ में दिया था। रविकांत नगाइच की नजर उन पर पड़ी थी मिस यंग इंडिया का खिताब जीतने के दौरान। साल 1968 में उन्होंने ये खिताब जीता और इसी के तुरंत बाद उन्हें अपनी पहली फिल्म मिल गई। राजेश खन्ना के साथ फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ में दिखने से पहले पूनम सिन्हा को यश चोपड़ा ने भी अपनी फिल्म ‘आदमी और इंसान’ में भी एक खास रोल दिया था। शत्रुघ्न सिन्हा से उनकी मुलाकात 1973 और1974 में रिलीज हुई फिल्मों क्रमश ‘सबक’ और ‘शैतान’ की शूटिंग के दौरान हुई और छह साल तक एक दूसरे को जानने समझने के बाद साल 1980 में दोनों ने शादी कर ली। उन दिनों की फिल्मों में वह कोमल के नाम से जानी जाती थीं।
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