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Maharani Review: सुभाष कपूर के नाम पर लगा बड़ा बट्टा, शागिर्द नहीं बना पाया दूसरी मैडम चीफ मिनिस्टर
निर्देशक सुभाष कपूर को अभी आमिर खान को लेकर टी सीरीज के संस्थापक गुलशन कुमार की बायोपिक बनानी है। ऋचा चड्ढा को लेकर जब उन्होंने ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ बनाई तो लगा कि वह सही रास्ते पर बढ़ रहे हैं। फिर शायद उनको लगा कि इस फिल्म के लिए बने कॉस्ट्यूम और तमाम दूसरी सामग्री कबाड़ में बेचने की बजाय क्यों न उसी रंग रोगन की एक और कहानी लगे हाथ निपटा दी जाए तो उन्होंने ‘महारानी’ बना डाली। वेब सीरीज में नाम बड़ा क्रिएटर का ही होता है और भले सीरीज का निर्देशन करण शर्मा ने किया हो पर ये सीरीज लोगों ने देखी सुभाष कपूर का ही नाम देखकर। सुभाष कपूर के नाम पर वेब सीरीज ‘महारानी’ बहुत बड़ा बट्टा है।
बिहार के लोगों को नहीं भाई ‘महारानी’
बिहार की कहानी को सोनी लिव ने प्रचारित भी बिहार में ही सबसे ज्यादा किया है लेकिन सोनी लिव के पास शायद अभी ये आंकड़े नहीं है कि वेब सीरीज पैसे देकर देखने वालों की तादाद किस हिंदी प्रदेश में और किस आय वर्ग में सबसे ज्यादा है। वैसे, सीरीज को सबसे ज्यादा नापसंद भी बिहार में रहने वाले लोग ही कर रहे हैं।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सोनी लिव का कमजोर सपोर्ट सिस्टम
अगर आपने सुभाष कपूर की फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ देखी है तो आपको याद होगा कि उस फिल्म में सुभाष बमुश्किल फर्स्ट डिवीजन पास हो सके थे। वहां उनके पास टी सीरीज का सहारा भी था। सोनी लिव के पास ऐसा कोई सपोर्ट सिस्टम है नहीं और न ही इस ओटीटी की मार्केटिंग टीम की ऐसी कोई मंशा ही अपने सितारों और सीरीज बनाने वालो को देने की दिखती भी है। एंटरटेनमेंट में पैसा ही पैसे को खींचता है। सोनी लिव का विजन 2021 हवा में दर्शक खींचता है। और, वैसी ही हवा हवाई ये सीरीज है, ‘महारानी’। मुंबइया फिल्ममेकर्स के लिए महिला मुख्यमंत्री इन सीजन का फेवरिट सब्जेक्ट है। ‘क्वीन’ को दुनिया देख चुकी है। ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ रिलीज हो चुकी है। ‘थलाइवी’ रिलीज होने वाली है। और इन्हीं कहानियों के बीच ‘महारानी’।
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सुभाष कपूर का कमजोर नजरिया
महिला सशक्तीकरण का पाठ पढ़ाने के नजरिए से लिखी जा रही इन कहानियों में एक सूत्र जो अब तक रिलीज हो चुके किस्सों में मिसिंग है, वह है इन कहानियों को उनके महिला किरदारों के नजरिये से देखना। पहले ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ में और अब ‘महारानी’ में सुभाष कपूर ने एक बेटी, एक बहन, एक प्रेमिका, एक पत्नी के हिसाब से कहानी कहने की बजाय एक पिता, एक भाई, एक प्रेमी और एक पति के नजरिये से दो महिला मुख्यमंत्रियों की कहानियां कही हैं। सुभाष कपूर की नजर यहां ठीक उस पत्रकार की तरह रही है जिसने देखा तो सब कुछ लेकिन वह अपनी खबर की कॉपी सिर्फ 550 शब्दों की लिखता है क्योंकि छपने के लिए स्पेस ही उतना है।
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जमा नहीं ‘रानी’ से ‘महारानी’ का सफर
‘महारानी’ की कहानी बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की लोकप्रियता से खाद पाती है। बीज इस कहानी का बिहार में ही है लेकिन सुभाष इस पौधे को बरगद नहीं बनने देते। वह इसकी पत्तियां, कलियां, कोपलें लगातार काटते रहते हैं और 10वें एपीसोड के आखिर तक ये पौधा सिर्फ बोंजाई ही बन पाता है। भीमा का असहाय होने पर अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाना समझ आता है। लेकिन, रानी की महारानी बनने की जो रफ्तार है, वह हजम होना मुश्किल है। गाय, गोबर और गोरी का ये सम्मिश्रण मुंबइया पब्लिक की आंखों पर तो ‘हिंदी हार्टलैंड’ का पर्दा डाल सकती है, लेकिन ये वेब सीरीज है 500 रुपये की टिकट वाला सिनेमा नहीं। हुमा कुरैशी ने अपने अभिनय में पूरी जान लगा दी है रानी से महारानी बनने में। लेकिन, उनका किरदार करीने से लिखा नहीं गया है। इस किरदार में थोड़ा और मां का आंचल, थोड़ा और पत्नी का कलेजा मिलना रह गया है।
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कलाकारों का मशीनी अभिनय
सीरीज के बाकी कलाकारों के बारे मे ये कहना मुश्किल है कि वाकई ये सीरीज उन्होंने अपने अभिनय प्रेम के लिए की है या फिर खालिस आर्थिक हित साधन के लिए। सोहम शाह का अभिनय देखकर लगता नहीं कि उन्होंने सिनेमा में लंबी पारी खेलने के लिए कोई लंबी प्लानिंग कर रखी है। वह बस जो भी किरदार मिल रहा है किए जा रहे हैं। अतुल तिवारी फिर भी राज्यपाल वाली गरिमा के अनुरूप अभिनय का पूरा प्रयास करते हैं। लेकिन, इस किरदार की अपनी सीमाएं हैं। जैसे कभी नेटफ्लिक्स पर राधिका आप्टे हर सीरीज, हर फिल्म में दिखने लगी थीं, वही हाल इन दिनों अमित सियाल का सोनी लिव पर है। उनकी मौजूदगी भी इस सीरीज का बड़ा माइनस प्वाइंट है। काबिले तारीफ काम सीरीज में हुमा कुरैशी के बाद अगर किसी का है तो वह हैं कनी। इस कलाकार में भविष्य की काफी संभावनाएं दिखती हैं। उनके चेहरे का ओज बताता है कि उनके भीतर कितनी ऊर्जा भरी है।
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