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Sooraj Barjatya: मैंने प्यार किया नहीं चलती तो राजश्री की आखिरी फिल्म होती, रीडर्स डाइजेस्ट से मिला क्लाइमेक्स

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 26 Aug 2024 07:06 AM IST
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Sooraj Barjatya reveals Maine Pyar Kiya is template of Mughal E Azam Rajkumar barjatya Rajshri productions
सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला

हाल ही में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म ‘ऊंचाई’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार सूरज बड़जात्या को मिला है। स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन के कार्यक्रम ‘वार्तालाप’ में इस बार सूरज की बारी रही और इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्मों की मेकिंग के दिलचस्प किस्से सुनाए। उन्हीं की जुबानी पढ़िए ये किस्सा उनकी पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ की मेकिंग का...

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Sooraj Barjatya reveals Maine Pyar Kiya is template of Mughal E Azam Rajkumar barjatya Rajshri productions
मैंने प्यार किया - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
‘मैंने प्यार किया’ हमारी आखिरी फिल्म होती

राजश्री की कई फिल्में चली नहीं थीं उन दिनों, तो ये था कि ‘मैंने प्यार किया’ बनेगी और अगर नहीं चलेगी तो ये आखिरी फिल्म होगी हमारी। पिताजी (राजकुमार बड़जात्या) ने कहा कि पहली पिक्चर है ये तुम्हारी तो ‘बी सेफ’। आप यकीन नहीं करेंगे कि उन्होंने मुझे लिखकर दिया एक टेम्पलेट कि ‘मुगले आजम’ बनाना है। एक अकबर होगा। एक सलीम होगा। एक अनारकली बाहर से आएगी। मोहब्बत होगी और फिर सलीम जाएगा। मैंने कहा ये तो बन चुका है। मैं क्या बनाऊं? उन्होंने कहा कि यही बनेगा लेकिन तुम अपने हिसाब से बनाओ। लेखक के बारे में पूछा तो निर्देश मिला कि तुम लिखो। मैंने कहा, मैंने कभी ऐसे नहीं लिखा। उन्होंने सीधे कहा, मुझे ऐसे वाला चाहिए ही नहीं।

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सूरज बड़जात्या व जमा हबीब - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मैं लिखता गया, फिल्म बनती गई

‘मैंने प्यार किया’ (1989) का हीरो 21 साल का है। मैं तब 21 का होने वाला था। पिताजी ने कहा कि जो जिंदगी तुमने जी है, वो लिखो। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने पहला सीन वह लिखा जहां सुमन को प्रेम के घर से निकाला जाता है और उसके पिता आ जाते हैं। ये कुछ ऐसा था कि अकबर अपने महल से अनारकली को निकल जाने को कह रहे हैं और उनके पिता आ जाएं। सुमन के पिता तब कहते हैं, आपका घर अगर फाइव स्टार होटल है तो मैं इसमें रहने की कीमत चुकाऊंगा। मुझे फिल्म लेखन का विज्ञान भी नहीं पता था कि फर्स्ट एक्ट क्या होता है, सेकंड एक्ट क्या होता है, थर्ड एक्ट क्या होता है। मैं लिखता और मेरे पिताजी अलग करते जाते कि ये थर्ड एक्ट में जाएगा, ये फर्स्ट एक्ट में जाएगा, ये सेकंड में..वगैरह वगैरह।

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सलमान खान और सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कैसा होगा हीरो?

मेरे पिताजी ने मुझसे जब सवाल किया कि मेरी फिल्म को हीरो कैसा होगा तो मैंने साफ कहा कि वह लव एट फर्स्ट साइट वाला तो होगा नहीं क्योंकि ऐसा होता नहीं है। तो सवाल कि फिर वह अनारकली से मिलेगा कैसे? मैंने कहा कि वह तीर-वीर तो मारेगा नहीं, हां कॉलेज में लड़का, लड़की साथ में रहते हैं तो लोग क्या क्या अफवाहें करते हैं। ब्लैकबोर्ड पर लिख देते हैं कि इनको प्यार है, वगैरह वगैरह। पिताजी ने कहा कि हां, तुम ये लाओ। मैंने पूछा भी कि अब लड़का और लड़की दोस्त भी होते हैं, आपको चलेगा? जवाब मिला कि वही चाहिए जो आपका चल रहा है। उनके शब्द थे, मुझे सिर्फ चाहिए प्यार की ऊंचाइयां और रिश्तों की गहराइयां। पटकथा तैयार हो गई तो संवाद की बारी आई। मुझे तब हिंदी ठीक से बोलनी नहीं आती थी तो मैंने जो अंग्रेजी में लिखा था, सीधा उसे हिंदी में अनुवाद कर दिया, ए बॉय एंड ए गर्ल कैन नेवर बी फ्रेंड्स, उसका पूरा का पूरा ट्रांसलेशन लिख दिया, एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।

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रीमा लागू और सलमान खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मां जैसी प्रेम की मां, गर्लफ्रेंड जैसी सुमन

पिताजी ने मुझे सिर्फ इतना कहा कि मुझे मौलिकता चाहिए। मुझे तुम्हारी जो उपज है, जो जिंदगी तुमने जी है। जैसी मां को देखा है, मुझे वो चाहिए। फिल्म में प्रेम की मां बनी रीमा लागू जी में मेरी मां की छवि है। सुमन में उस लड़की की छवि है जिसे मैं बहुत पसंद करता था। उस एहसास के लम्हे हैं। मैंने अपनी बहन, चाचा, मामी में जो जो देखा, वही सब मैं लिखता गया। पिताजी बस पूछते कि इन दिनों क्या चलता है? वह बोलते गए, मैं लिखता गया। वही सलमान करते गए। हमें पता ही नहीं चला और फिल्म बन गई। लेकिन, अब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे असल की ताकत और जिंदगी के अहसासों की ताकत का अंदाजा होता है।

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