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EXCLUSIVE INTERVIEW: अब बनेगी असली ओटीटी रेटिंग लिस्ट, सामने आएगा Most Watched के पीछे का सच

Sun, 27 Dec 2020 11:57 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 27 Dec 2020 11:57 AM IST
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Flyx CEO Shashank Singh speaks Pankaj Shukla on ott rating Netflix Prime Video Mx Player most watched
पंकज शुक्ल, शशांक सिंह - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

आपने हाल ही में वह दावा पढ़ा होगा जिसमें अमेजन प्राइम वीडियो ने अपने प्लेटफॉर्म पर रिलीज फिल्म ‘कुली नंबर वन’ को सबसे ज्यादा बार देखे जाने का दावा किया है। इससे पहले ऐसे दावे एमएक्स प्लेयर ने अपनी महत्वाकांक्षी वेब सीरीज ‘आश्रम’ को लेकर और डिजनी प्लस हॉटस्टार ने ‘दिल बेचारा’ और ‘लक्ष्मी’ फिल्म को लेकर किए। कथ्य के लिहाज से ये चारों दोयम दर्जे की कहानियां हैं और दर्शकों ने इनके बारे में सोशल मीडिया पर अपनी राय भी खुलकर जाहिर की है। टीवी कार्यक्रमों की दर्शक संख्या बताने वाली एजेंसी बार्क की तरह अभी ओटीटी के दर्शकों की संख्या बताने वाली कोई निष्पक्ष एजेंसी नहीं बनी है। जो भी दावे अब तक इस बारे में किए जा रहे हैं, वे सब संदिग्ध हैं। ओटीटी के इस गड़बड़झाले पर ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने लंबी बातचीत की फ्लिक्स के सीईओ शशांक सिंह से। फ्लिक्स एप को हाल ही में ‘बेस्ट ऑफ 2020 गूगल प्ले अवॉर्ड’ मिला है। शशांक अमेरिका में रहते हैं, लेकिन दिल से हिंदुस्तानी हैं।  

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शशांक सिंह - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

शशांक, हिंदुस्तान की पढ़ाई अमेरिका में कितनी काम आई?
मेरी स्कूली शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई है। उन दिनों पापा उत्तर प्रदेश की सीमा पर रहते थे। एनटीपीसी में नौकरी करते थे। फिर कॉलेज में आया तो इंजीनियरिंग में रुचि थी और मैंने गोरखपुर में दाखिला लिया। उत्तर प्रदेश के सबसे पुराने संस्थानों में से एक मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज में। कॉलेज के बाद दो साल इन्फोसिस, बैंगलोर में काम किया और उन्हीं दिनों एक सलाहकार कंपनी के लोग मुझे अमेरिका ले आए। यहां मैंने यूबीएस, बैंक ऑफ न्यूयॉर्क जैसे वित्तीय संस्थानों में काम किया और काफी समय मैंने गोल्डमैन सैक्स में बिताया। जब मैंने अमेरिका की धरती पर कदम रखा तो मेरा एक ही सपना था कि मुझे वॉल स्ट्रीट के सबसे अच्छे बैंक में काम करना है। फिर मैंने एमबीए भी किया और वहां से थोड़ी मेरी दिलचस्पी हुई अपना कारोबार शुरू करने में। 2006 में मैं जब अमेरिका आया था तभी से यहां अपने कारोबार में रुचि होने लगी थी। भारत में तब लोग सेवाएं देने के लिए इच्छुक हुआ करते थे।

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शशांक सिंह - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

तो फ्लिक्स एप की शुरूआत कैसे हुई?
दो तीन साल पहले मैंने अपना केबल कनेक्शन कटवा दिया। अमेरिका में इसे ‘कॉर्ड कटिंग’ कहते हैं। ये उन दिनों की बात है जब भारत के टीवी चैनल भी इंटरनेट पर अमेरिका में मिलने लगे थे। किसी भी केबल कनेक्शन में औसतन तीन चार सौ चैनल तो होते ही हैं, लेकिन हम देखते हैं केवल इनमें से दस या बीस। रात को नौ बजे आपने टीवी ऑन किया और इन 20 में कुछ सर्फिंग किया और ढूंढ़ लिया, जो देखना है। लेकिन, इंटरनेट की दुनिया अलग है। यहां लाखों में एक चीज ढूंढनी होती है। एक चीज होती है, डिसीजन पैरालिसिस यानी फैसले लेने की क्षमता खो देना। इतने ऑप्शन्स मिले देखने को तो यही हुआ। मैं थककर ऑफिस से आता था और मेरे पास एक घंटा होता था अपने मनोरंजन के लिए और इसमें भी ज्यादातर समय मेरा चला जाता था सर्फिंग करने में, इसे हम कहते हैं, ‘व्हाट टू वॉच’। फिर मैंने अपने दोस्तों से पूछना शुरू किया। उनकी पसंद के हिसाब से देखना शुरू किया, लेकिन वे भी हर समय बताने को कहां उपलब्ध होते हैं, तो यहीं से फ्लिक्स के विचार ने जन्म लिया।

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हंसल मेहता, शशांक सिंह, मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

इस विचार को किन्हीं आंकड़ों से भी बल मिला?
इस विचार का जन्म दो साल पहले हुआ। तब मुझे लगने लगा था कि ‘क्या देखें’ वाली समस्या बढ़ती ही जाएगी। दुनिया भर की स्ट्रीमिंग सेवाएं भारत पहुंच चुकी हैं। भारत के अपने भी ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं। तो इस पर शोध शुरू हुआ। पता ये चला कि औसतन लोग 24 मिनट से ज्यादा तो कुछ ‘अच्छा’ ढूंढने में ही खर्च कर देते हैं। इसमें से आधे लोग ये खोजते हैं कि देखने के लिए नया क्या है? और इसमें से भी 62 फीसदी लोग फिर भ्रमित हो जाते हैं कि क्या देखें या क्या नहीं, तो शोध के मुताबिक 20 फीसदी लोग तो वही देखने लग जाते हैं जो पहले देख चुके हैं। वहां गारंटी ये होती है कि कम से कम अपनी पसंद का तो देख रहे हैं।

तो ऐसा भी कोई डाटा आपको मिला जिसमें तलाश करते करते लोग उम्मीद ही छोड़ ही देते हों कि जाओ, अब नहीं देखना?
बहुत अच्छा सवाल आपने पूछा। ऐसा डाटा हम भी ढूंढ़ रहे थे। नेटफ्लिक्स का अपना ही एक एक डाटा निकल कर आया, जो नेटफ्लिक्स ने अपने यूजर्स के बीच किया। इसे संक्षिप्त में कहते हैं, 90 सेकंड्स ऑर बस्ट। एक यूजर आया एक एप पर और 90 सेकंड्स में अगर आपने उसे अच्छे टाइटल नहीं दिखाए तो वह चला जाएगा। 90 सेकंड के भीतर आपको कुछ अच्छा दिखाना पड़ता है नहीं तो वह इसे छोड़कर चला जाएगा।

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शशांक सिंह - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

जैसा कि आपने बताया कि फ्लिक्स एप पर अगर आपके दोस्त, रिश्तेदार मौजूद हैं तो आपको ओटीटी पर क्या क्या अच्छा चल रहा, इसका पता चलता रहता है, भारत में कैसी प्रतिक्रिया रही है अब तक?
भारत से बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला है हमें। मई में जब हमने इसे लॉन्च किया तो हमारा फोकस था कि भारत और अमेरिका दोनों जगह फोकस करेंगे। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा स्ट्रीमिंग मार्केट है डॉलर वैल्यू में। भारत ओटीटी का सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है। हम दोनों बाजारों में मौजूद रहना चाहते हैं। ओटीटी में विचारशील नेतृत्व की जरूरत थी और हमने खुद को इसी स्थान पर स्थापित करने में सफलता पाई है।

उसके व्यूज का आखिर तार्किक आधार क्या है? फ्लिक्स इस दिशा में क्या करने जा रहा है?
बार्क में काम कर चुके एक पूर्व अधिकारी हाल ही में हमारे भारत प्रमुख बने हैं। ओटीटी का जो क्षेत्र है, वह नया है और इसमें अभी रेटिंग्स नहीं है। बार्क या नील्सन जैसे करती हैं, वह टीवी रेटिंग के लिए लोगों के घरों में एक उपकरण लगाते हैं। ऐसे घर पूरे देश में 40 या 50 हजार के करीब ही होते हैं, बस। हम उनसे दो कदम आगे होने जा रहे हैं। हम डाटा सीधे स्रोत से लेंगे। लोग क्या देख रहे हैं, अगर उन्होंने वह हमारे साथ साझा करना शुरू कर दिया तो हम वह डाटा निकाल सकते हैं कि कौन-सा शो सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। सब लोग इसके लिए हमारा साथ दें हीं, वह भी जरूरी नहीं है लेकिन अगर जरूरत भर लोग भी अपना डाटा साझा करते हैं तो भी हमारे लिए ये काफी है। 40 हजार से बहुत ज्यादा लोग फ्लिक्स एप को यूज करते हैं। जैसे जैसे इसका प्रयोग बढ़ेगा, हमारे डाटा की शुद्धता बढ़ती जाएगी।

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