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पंजाब का अकेला कस्बा जहाँ बहुसंख्यक हैं मुसलमान
वंदना संवाददाता, दिल्ली
Updated Thu, 02 Feb 2017 04:51 PM IST
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1947 में बंटवारे के वक्त जब सरहद के दोनों ओर का पंजाब हिंसा की आग में जल रहा था और कत्ल-ए-आम का मंजर था, तो उस दौरान एक इलाका ऐसा था जो हिंसा के साए से दूर था। इस जगह का नाम था मलेरकोटला जो आज भारतीय पंजाब का एकमात्र मुस्लिम बहुल कस्बा है।
पंजाब के गुरुद्वारों, मंदिरों के बीच में यहाँ की जामा मस्जिद और शीश महल की अपनी अहमियत है। 50 साल के मास्टर खलील मलेरकोटला में ही रहते हैं। वो एक किस्सा सुनाते हैं जो हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को सुनाती आई है।
नवाब ने दिया था सिखों का साथ
मास्टर खलील बताते हैं, "मलेरकोटला के नवाब थे शेर मोहम्मद खान। उस दौरान मुगल बादशाहों और सिख गुरुओं के मानने वालों के बीच जबर्दस्त संघर्ष चल रहा था।" मुगलों ने उस समय गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों को दीवार में जिंदा चुनवाने का आदेश दिया था
जिन्हें सरहिंद में 1705 में पकड़ा गया था। लेकिन मलेरकोटला के नवाब ने इसे गैर-इस्लामिक बताकर इसका विरोध किया था। तब से ही सिखों और यहाँ के मुसलमानों के बीच अनोखा रिश्ता रहा है।"
जिन्हें सरहिंद में 1705 में पकड़ा गया था। लेकिन मलेरकोटला के नवाब ने इसे गैर-इस्लामिक बताकर इसका विरोध किया था। तब से ही सिखों और यहाँ के मुसलमानों के बीच अनोखा रिश्ता रहा है।"
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आजादी के बाद दंगों के दौरान बहुत से लोगों को उस समय मलेरकोटला के नवाब इफ्तिखार अली खान ने शरण दी थी। लुधियाना से कोई 43 किलोमीटर दूर बसे मलेरकोटला में कभी मुगलकाल में नवाबों की मनसबदारी थी।
लेकिन आजादी के बाद तरक्की और विकास की रेस में मलेरकोटला काफी पिछड़ गया है। अगर मौजूदा दौर की बात करें तो गीतकार इरशाद कामिल, अदाकार सईद जाफरी यहीं के बाशिंदे रहे हैं।
लेकिन आजादी के बाद तरक्की और विकास की रेस में मलेरकोटला काफी पिछड़ गया है। अगर मौजूदा दौर की बात करें तो गीतकार इरशाद कामिल, अदाकार सईद जाफरी यहीं के बाशिंदे रहे हैं।
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सईद जाफरी, बॉबी जिंदल का भी गाँव
अमरीका के बॉबी जिंदल का परिवार भी मलेरकोटला से कोई आठ किलोमीटर दूर एक गाँव का ही है। बॉबी जिंदल आखिरी बार तब यहाँ आए थे जब वो करीब नौ साल के थे। 2011 की जनगणना के मुताबिक मलेरकोटला की 135424 की आबादी में से 68।50 फीसदी लोग मुसलमान हैं, 20।71 फीसदी हिंदू और 9।50 फीसदी लोग सिख हैं।