कश्मीर में एक बार फिर से कश्मीरी पंडित, हिंदुओं और सिखों को आतंकी अपना निशाना बना रहे हैं। लगातार हो रही हत्याओं के चलते लोग कहने लगे हैं कि घाटी में 1990 जैसे हालात बन रहे हैं। कश्मीर में रहने वाले हिंदू और कश्मीरी पंडित तो बोल रहे हैं कि अगर ये जल्द से जल्द नहीं रुका तो 90 के दशक से भी ज्यादा बुरा दौर आ जाएगा।
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पिछले छह महीने के अंदर 18 से ज्यादा कश्मीरी हिंदुओं और सिखों को निशाना बनाया जा चुका है। डरे सहमे हिंदू और सिख घाटी से पलायन करने लगे हैं। कई ऐसी तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैं।
पहले जान लीजिए कश्मीर में कितने हिंदू रहते हैं?
एक आंकड़े के अनुसार कश्मीर में सवा लाख हिंदू रहते हैं। यहां पीएम पैकेज के तहत करीब साढ़े पांच हजार हिंदू कर्मचारी काम कर रहे हैं। इसमें साढ़े तीन हजार कश्मीरी पंडित हैं। ये वो हैं, जिन्होंने 90 के दशक में भी घाटी नहीं छोड़ी थी। इनके अलावा गैर कश्मीरी सरकारी मुलाजिम और निजी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या भी तकरीबन दस हजार है। सरकारी स्कूलों में अनुसूचित जाति के तहत नियुक्त शिक्षक भी तीन हजार के आसपास हैं। ऐसे में कुल मिलाकर सवा लाख से अधिक हिंदू कश्मीर के विभिन्न जिलों में रह रहे हैं। लगभग 65 हजार सिख भी घाटी में हैं।
90 वाले दौर की याद दिला रहीं ये हत्याएं
कश्मीर में हो रही टारगेट किलिंग के इस नए दौर से कश्मीर में काफी खौफ का माहौल है। टारगेट किलिंग का ये सिलसिला पिछले साल शुरू हुआ। जब श्रीनगर में कृष्णा ढाबा के मालिक आकाश मेहरा को उनके रेस्टोरेंट के अंदर ही गोली मार दी गई थी। इसके बाद पांच अक्टूबर 2021 को घाटी के मशहूर दवा कारोबारी एम एल बिंद्रू की उनकी दुकान में हत्या कर दी गई।
बिंद्रू की हत्या के दो दिन बाद ही श्रीनगर में स्कूल प्रिंसिपल सुपिंदर कौर और फिर दीपक चंद नाम के एक शिक्षक को आतंकवादियों ने मार डाला था। इन दोनों को मारने से पहले आतंकियों ने इनके पहचान पत्र देखे थे। हाल में राहुल भट, रजनी बाला, विजय कुमार, बाल कृष्ण भट, सतीश जैसे कई लोगों को निशाना बनाया जा चुका है। लगातार हो रहीं ये हत्याएं कश्मीर के लोगों को 90 का दौर याद दिलाने लगी हैं।
पिछले महीने राहुल भट की हत्या के बाद से कश्मीरी पंडितों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू किया था, लेकिन अब सभी ने नौकरी छोड़कर पलायन का एलान कर दिया है।
90 के दशक में क्या-क्या हुआ था?
ये बात 14 मार्च 1989 की है, जब श्रीनगर में प्रभावती नाम की महिला को आतंकवादियों ने मार डाला था। इसके बाद मशहूर वकील पंडित टीका राम टपलू को श्रीनगर में उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई। फिर रिटायर्ड जज नीलकांत गंजू समेत कई कश्मीरी हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा जाने लगा।
19 जनवरी 1990 की आधी रात को हजारों कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के बाद भी टारगेटेड किलिंग का ये सिलसिला नहीं थमा। कश्मीरी पंडित महिलाओं की रेप के बाद हत्याएं होने लगीं। 31 मार्च 1992 को श्रीनगर में आतंकियों ने एक शख्स के सामने उसकी पत्नी और बेटी का गैंगरेप किया और बाद में तीनों को गोली मार दी।
21-22 मार्च 1997 को आतंकियों ने सात कश्मीरी हिंदुओं को बडगाम के संग्रामपुरा गांव में घरों से खींचकर गोलियों से भून दिया। 25 जनवरी 1998 को वंधामा गांव में महिलाओं, बच्चों समेत 23 कश्मीरी पंडितों का आतंकियों ने नरसंहार किया। 24 मार्च 2003 को नदीमार्ग गांव में आतंकियों ने नवजात बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया।
मौजूदा हालात पर क्या कहते हैं कश्मीरी हिंदू?
हमने इसके लिए कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के संजय टिक्कू से संपर्क किया। संजय टिक्कू ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने 90 के सबसे बुरे दौर में भी घाटी को नहीं छोड़ा था। वह कहते, 'कश्मीर में रहने वाले हिंदुओं में जबर्दस्त भय व दहशत का माहौल है। नब्बे से भी खराब हालात बनाने की साजिश है। चरम आतंकवाद में भी दो घटनाओं को छोड़कर कार्यालय व दुकानों में लोगों की हत्या नहीं की गईं थीं, लेकिन अब तो दुकान व कार्यालयों में हत्या आम हो गई है।'
संजय आगे कहते हैं, 'सरकार को नियमित रूप से ओजीडब्ल्यू नेटवर्क को ध्वस्त करना चाहिए। साथ ही हिंदू समाज में सुरक्षा का भाव पैदा करना चाहिए ताकि वे घाटी न छोड़ें और नापाक साजिश ध्वस्त हो सके।'