आजादी के बाद से अब तक के वो नारे जिन्होंने बदल दिया राजनीति का इतिहास
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"अच्छे दिन आने वाले हैं" - "हर हर मोदी, घर घर मोदी"
2014 लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए "हर हर मोदी, घर घर मोदी" का नारा दिया था, जिसने देश में मोदी लहर को हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस बीच नरेन्द्र मोदी द्वारा दिया गया अच्छे दिन का नारा भी लोगों की जुबान पर चढ़ा रहा। नारा था "अच्छे दिन आने वाले हैं"। इसी के बाद भाजपा देश में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली पहली गैर कांग्रेसी पार्टी बन कर सामने आई।
"हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है"
2007 में उत्तर प्रदेश में मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने "हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है" के नारे के बलबूते पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई थी। माना जाता है कि सामान्य तौर पर अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बीच लोकप्रिय पार्टी को ब्राह्मण वोटरों का फायदा पहुंचाने के इरादे से मायावती ने यह नारा दिया था।
"कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ"
2004 में लोकसभा चुनवों के दौरान यूपीए गठबंधन में कांग्रेस का मुख्य नारा था 'कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ'। हालांकि सभी को उम्मीद थी कि इस बार एनडीए सरकार सत्ता में वापसी करेगी, लेकिन 13 मई को चुनाव परिणाम आने पर मालूम हुआ कि इसी नारे के साथ कांग्रेस ने 218 सीटों पर जीत हासिल कर के भाजपा के "इंडिया शाइनिंग" के नारे को मात दे दी।
"सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी"
1998 में हुए 12वें लोकसभा चुनावों के दौरान, भारतीय जनता पार्टी लोगों की भावनाओं और आस्था से जुड़े मुद्दे पर लड़ रही थी। उस दौरान राम मंदिर मसला सबसे संवेदनशील विषय था। इसी बीच भाजपा ने अपनी नीति पर आधारित दो नारे दिए थे जिसे जनता का पुरजोर समर्थन मिला। इनमें से एक था, "राम, रोटी और स्थिरता" और दूसरा नारा था "सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी"। इन नारों का असर यह हुआ कि 12वें चुनावों में भाजपा को कुल 182 सीटों पर जीत मिली।