आज समाजवादी पार्टी टूट चुकी है, बंट चुकी है। मुलायम अलग हैं, शिवपाल अलग। मुलायम, अखिलेश से कुछ रूठे-रूठे रहते हैं। जानिए, कैसे शुरू हुआ यूपी की सियासत में अहम जगह रखने वाली पार्टी का सफर।
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समाजवादी पार्टी: 27 साल पहले शुरू हुआ साइकिल का सफर और मंजिलों की मुश्किल
Sun, 07 Apr 2019 04:16 PM IST
Prabudhh Jain
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Prabudhh Jain
Updated Sun, 07 Apr 2019 04:16 PM IST
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मुलायम सिंह यादव-चन्द्रशेखर
- फोटो : Social Media
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कांशी राम-मुलायम सिंह यादव
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साल 1993 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी और कांशीराम की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर 67 सीटें जीतीं। तब देश मंदिर, मस्जिद के नाम पर उबल रहा था। बसपा-सपा के गठबंधन के बाद देश में एक नया नारा गूंज उठा था- 'मिले मुलायम, कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम।'
मुलायम सिंह यादव-मायावती
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बसपा में मायावती कहने को उपाध्यक्ष थीं लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका दबदबा बढ़ रहा था। राज्य के सीएम की कुर्सी पर बैठे मुलायम सिंह को ये रास नहीं आया और वह सीपीआई, सीपीएम और जनता दल के विधायकों को तोड़ कर बहुमत के लिए बसपा में भी तोड़- फोड़ की कोशिश करने लगे। कहा जाता है कि इसी के बाद मायावती को डराने के लिए गेस्ट हाउस कांड हुआ। सपा के नेता बसपा के 12 विधायकों को भी जबरदस्ती ले गए थे।
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मुलायम सिंह यादव
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1996 के चुनाव में मुलायम सिंह ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर लाने की कोशिश की और वो पहली बार संसद पहुंचे। मुलायम सिंह का नाम संयुक्त मोर्चे वाली सरकार में प्रधानमंत्री के लिए तय होते- होते रह गया। बाद में वो देवगौड़ा की सरकार में रक्षा मंत्री बने।
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मुलायम सिंह यादव
- फोटो : Social Media
दिल्ली की राजनीति में समाजवादी पार्टी की जगह नहीं बनते देख मुलायम सिंह ने समाजवादी साइकिल को फिर से यूपी की सड़क पर दौड़ा दिया। अपने संगठनात्मक मजबूती के बल पर सपा यूपी में सत्ता में लौटी और 29 अगस्त 2003 को मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने। 2004 का लोकसभा चुनाव, समाजवादी पार्टी के लिए ऐतिहासिक रहा। सपा ने 35 लोकसभा सीटें जीती लेकिन दिल्ली की सत्ता में जगह नहीं बना पाई। दूसरी ओर मुलायम सिंह का कार्यकाल भी बतौर मुख्यमंत्री कुछ खास नहीं रहा। उसके बाद के पांच साल समाजवादी पार्टी के लिए बेहद ही उठापटक वाले रहे।