उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से गठबंधन टूटने के बाद से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा में अफरा-तफरी मची हुई है। एक के बाद एक कई नेता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। इन सभी नेताओं के निशाने पर पार्टी के मुखिया ओम प्रकाश राजभर हैं। बागी नेताओं का आरोप है कि ओपी राजभर केवल अपने परिवार को बढ़ा रहे हैं। वह पैसा लेकर पार्टी का टिकट बेचते हैं।
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ऐसे में सवाल उठने लगा है कि आखिर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी कौन तोड़ रहा है? इसके मायने क्या हैं? अब तक कौन-कौन ओपी राजभर का साथ छोड़ चुका है? आइए इसे समझते हैं...
अब तक कौन-कौन ओपी राजभर का साथ छोड़ चुका है?
सबसे पहले पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और संस्थापकों में शुमार रहे महेंद्र राजभर ने इस्तीफा दिया। उन्हें पार्टी में दूसरे नंबर का नेता माना जाता था। महेंद्र के साथ 30 से ज्यादा नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया था। इसके बाद पार्टी के प्रवक्ता संतोष पांडे, किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष मास्टर राधेश्याम सिंह, कुशीनगर के जिलाध्यक्ष और जिला प्रभारी सहित 100 से ज्यादा नेताओं ने राजभर का साथ छोड़ दिया। कई और नेता लाइन में बताए जा रहे जो पार्टी छोड़ सकते हैं।
पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का क्या आरोप है?
सुभासपा छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं का आरोप है कि ओम प्रकाश राजभर केवल अपने परिवार को आगे बढ़ा रहे हैं। चुनाव में पैसे लेकर टिकट बांटते हैं। महेंद्र राजभर ने पार्टी छोड़ते वक्त कहा कि ओम प्रकाश राजभर केवल मुख्तार अंसारी की बात सुनते हैं। जो मुख्तार अंसारी कहते हैं, वही ओम प्रकाश राजभर करते हैं।
इसी तरह पार्टी में कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके मास्टर राधेश्याम सिंह ने आरोप लगाया कि ओम प्रकाश राजभर ने पार्टी नहीं बल्कि रुपए वसूलने की मंडी खोल रखी है। उन्होंने अपने खुद के खाते 20 लाख रुपये ट्रांसफर करने का दावा भी किया है।
कौन तोड़ रहा ओपी राजभर की पार्टी?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'दरअसल ओम प्रकाश राजभर वन मैन आर्मी बनकर रहना चाहते हैं। 2017 में जब उनका गठबंधन भाजपा से हुआ था और वह प्रदेश में मंत्री बनाए गए थे, तब से उनका रवैया अलग होने लगा था। भाजपा से गठबंधन टूटा तो वह सपा के साथ आ गए। चुनाव के बाद जब सपा से गठबंधन टूटा तो उनकी चमक और फिकी पड़ गई। ये बात उनके पार्टी के नेता भी जानते हैं। यही कारण है कि एक-एक करके सारे नेता ओम प्रकाश राजभर का साथ छोड़ते जा रहे हैं।' प्रमोद आगे कहते हैं, 'सुभासपा छोड़ने वाले नेता समाजवादी पार्टी या फिर भाजपा का दामन थाम सकते हैं। ये सारे नेता अभी संभावना तलाश रहे हैं।'
क्या है इसके सियासी मायने?
प्रमोद कहते हैं, 'सुभासपा ने पिछले सात से आठ वर्षों में राजभर समाज में अच्छी पकड़ बना ली है। इसके अलावा भी कई पिछड़ी जातियों पर उनका दबदबा बन गया है। खासतौर पर पूर्वांचल के 20 सीटों पर ओपी राजभर के वोटर्स हैं। ऐसे में पार्टी में बगावत ओपी राजभर के लिए अच्छा संदेश नहीं है। सपा और भाजपा दोनों ही ओपी राजभर की पार्टी में पड़ रही टूट का फायदा उठाने में जुटे हैं, जिससे 2024 लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को मजबूती मिल सके। '