Priyadarshan Interview: जो बच्चों को हंसा सके, वही असली कॉमेडी, परिवार को सिनेमा हॉल तक लाना ही अब असल चुनौती
हिंदी सिनेमा में प्रियदर्शन का नाम क्लासिक फिल्मों ‘हेराफेरी’, ‘भूल भुलैया’ और ‘गरम मसाला’ आदि के लिए आज भी सम्मान से लिया जाता है। बरसों बाद वह अक्षय कुमार के साथ अपनी अगली हिंदी फिल्म ‘भूत बंगला’ बनाने जा रहे हैं। प्रियदर्शन से ये खास बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
हास्य, व्यंग्य और उपहास में किस विधा को एक कॉमेडी फिल्म की जरूरत आप मानते हैं?
मेरे लिए किसी भी कॉमेडी फिल्म को बनाने का एक ही सूत्र है और वह ये कि क्या ये फिल्म किसी बच्चे को हंसा सकती है। चार्ली चैपलिन के दिनों से शुरू करके आज हम वहां आ गए हैं, जहां दूसरों का मजाक उड़ाने पर लोग हंसते हैं। स्टैंडअप कॉमेडियन के सामने मजबूरी है कि उसको उन्हीं 90 मिनट या दो घंटे में सामने बैठे दर्शकों को रोककर रखना है। सिनेमा की ऐसी कोई मजबूरी नहीं है।
और, क्या सिनेमा में फूहड़ता और गालियों की वजह से भी लोगों का सिनेमाघरों तक आना कम हुआ है?
हां, और ये एक दिन में नहीं हुआ है। दर्शकों का किसी कला से मोहभंग समय के साथ साथ होता है। सिनेमा में फिल्म दर्शकों की रुचि के क्षरण के जिम्मेदार वे सारे लोग हैं जिन्होंने दर्शकों को लुभाने के लिए अलग अलग तरह के टोटके ईजाद करने शुरू कर दिए। फिल्में वही हिट होती हैं जिन्हें लोग समूहों में देखने आएं। अब कोई भी परिवार अपने बच्चों के साथ लेकर कोई कॉमेडी फिल्म देखने मुश्किल से ही जाता है।
आपको आज की पीढ़ी के बच्चों के साथ कितना संवाद होता है?
सिनेमा शुरू से अपने दौर के युवाओं की पसंद के साथ ही चलता रहा है। 19 साल से लेकर 30 साल तक के लोग ही अपने परिजनों के साथ ये तय करते हैं कि सिनेमाघर जाकर कौन सी फिल्म देखनी है। मैं इसीलिए अपने बच्चों के साथ अपनी फिल्मों के विचार बांटता रहता हूं। उनकी प्रतिक्रियाएं मिलने के बाद ही मैं अपनी फिल्म लिखने बैठता हूं।
मलयालम सिनेमा की कई फिल्में हाल के दिनों में हिंदी फिल्म दर्शकों के लिए नए सिरे से हिंदी फिल्म सितारों के साथ बनाई गईं, आपके अनुसार दर्शकों की पसंद पर इनके खरे न उतरने की वजह क्या हो सकती है?
किसी भाषाई फिल्म को किसी ऐसे वृहत्तर दर्शक समूह के लिए बनाना जिसकी भाषा, रुचियां और संवेदनाएं अलग हैं, बहुत तैयारी मांगता है। बिना विषय की रूह को समझे सिर्फ रीमेक के लिए फिल्म बना देना सही निर्णय नहीं है और इसीलिए हिंदी में बन रही भाषाई फिल्मों की रीमेक सफल नहीं हो रही हैं। इन फिल्मों के निर्देशक अब भी नहीं समझ पा रहे हैं कि गलती कहां हुई?
आपके हिसाब से हिंदी सिनेमा के निर्माता या निर्देशक कहां चूक रहे हैं?
सबसे पहली जरूरत किसी फिल्ममेकर के लिए ये होनी चाहिए कि वह अपने दर्शकों को समझे। उनकी पसंद जाने। उनकी रोजमर्रा की दिक्कतों से दो-चार हो। एक उदाहरण से इसे यूं समझा जा सकता है कि किसी प्रेम कहानी में प्रेमी-प्रेमिका के द्वंद्व के कारक अब बदल चुके हैं। अब उन्हें अमीरी-गरीबी या अपने माता-पिता या भाषाई भिन्नता के चलते प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। उनका प्रतिरोध अब भीतरी है। अब उनका द्वंद्व खुद से है, एक दूसरे की राजनीतिक विचारधारा से है, एक दूसरे के अपने अपने कारोबार में आने वाली परेशानियों से है।
मतलब कि आज के निर्देशक बदलते समय के साथ खुद को बदल नहीं रहे हैं?
ये बात दूसरी तरह से भी मैं कह सकता हूं और वो ये कि सिनेमा बदलते समाज का आईना होता है। और, अगर कोई भी फिल्ममेकर इस आईने में बदलाव को नहीं भांप पा रहा है तो वह ज्यादा दूर तक नहीं जा पाएगा। हर बड़ा फिल्ममेकर तभी लंबे समय काम कर पाया, जब उसने अपने निर्देशन को, अपनी कहानियों को और अपनी फिल्म मेकिंग को बदलते समय में बदलते दर्शकों के साथ बदला और अपना अनुकूलन समय के इस बदलाव के साथ जारी रखा।
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हिंदी सिनेमा में आपकी पिछली फिल्म ‘हंगामा 2’ सफल नहीं रही। अब आप अक्षय कुमार के साथ दो फिल्में और बना रहे हैं? क्या योजनाएं हैं इन फिल्मों की?
‘हेराफेरी 3’ पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन हां, मेरी हिंदी सिनेमा में एक बड़े बजट की फिल्म के साथ अरसे बाद वापसी हो रही है। बरसों बाद में अक्षय कुमार के साथ काम करने जा जा रहा हूं। ये एक बहुत ही खास फिल्म होगी और अब मैं इस फिल्म के जरिये सिनेमा का जादू फिर से जगाने को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हूं।
Thank you for your love on my birthday, year after year! Celebrating this year with the first look of ‘Bhooth Bangla'! I’m beyond excited to join forces with Priyadarshan again after 14 years. This dream collaboration has been a long time coming… can’t wait to share this… pic.twitter.com/2Wnim0mWBu
— Akshay Kumar (@akshaykumar) September 9, 2024
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प्रियदर्शन की सौंवी फिल्म कौन सी होगी, इसे लेकर भी लोग तरह तरह की अटकलें लगा रहे हैं, क्या ये फिल्म आपके खासमखास दोस्त मोहनलाल के साथ ही होगी?
सिनेमा को लेकर मेरा पक्का विचार यही है कि इसे आंकड़ों की बाजीगरी में नहीं उलझाया जाना चाहिए। एक निर्देशक को अपनी फिल्म की मोटी मोटी गणित तो आनी चाहिए लेकिन सिर्फ गणित के लिए सिनेमा भी नहीं बनाना चाहिए।