ऑस्कर के लिए नामित हुई फिल्म ‘लापता लेडीज’ और कान में ग्रां प्रि पुरस्करार जीतने वाली फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’, दोनों के कलाकारों के चयन में शामिल रहे राम रावत को छोटे शहरों और कस्बों में छिपे हुनरमंद अभिनेताओं की खोज में महारत हासिल है। मुंबई में न रहने वाले देश भर के इन कलाकारों को वह एक छतरी के नीचे लाने के लिए भी प्रयासरत हैं। ‘अपना अड्डा’ सीरीज के लिए राम से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की बातचीत।
Apna Adda 26: अब छोटे शहरों तक खुद पहुंच रहा मुंबई का सिनेमा, कास्टिंग डायरेक्टर राम रावत के दिलचस्प खुलासे
काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी परिवार का बालक मुंबई फिल्म नगरी कैसे आ गया?
ये बात साल 2012 की। प्रतीक बब्बर और अमायरा दस्तूर अभिनीत फिल्म ‘इसक’ की शूटिंग बनारस में हो रही थी और एक दिन लस्सी की दुकान पर फिल्म की शूटिंग के लिए मकरंद देशपांडे और फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइन नम्रता जानी से हमारी भेंट हो गई। दोनों पूजापाठ वाली वेशभूषा की तलाश में थे और हमने उनकी मदद का प्रस्ताव रख दिया। फिल्म में मकरंद जो कपड़े पहने दिखते हैं, वे मेरे परिधान हैं। उसके बाद हम उनकी मदद करते रहे और नम्रता जानी के साथ बाकी काम भी करने लगे।
अच्छा! तो मुंबई आने के बाद मिले कभी मकरंद देशपांडे से?
मैंने संस्कृत माध्यम से स्नातक किया है। शास्त्री की उपाधि हासिल की है मैंने। लेकिन, फिल्मों का ऐसा चस्का लगा कि मैं बिना किसी को बताए वाराणसी से मुंबई चला आया। यहां आकर जब पहली बार मकरंदजी से पृथ्वी थियेटर पर मिला तो वह देखते ही पहचान गए। गले लगाकर बोले, यहां क्यों चले जाए, घर चले जाओ। ये काम बहुत कठिन है। यहां कैसे गुजारा कर पाओगे?
लेकिन, आप डटे रहे?
हां, मैं ये तो तय करके आया था कि फिल्में ही अब मेरा जीवन हैं तो वापसी का तो सवाल ही नहीं। बहुत धक्के खाए। बहुत खराब परिस्थितियों से भी गुजरा लेकिन चूंकि निश्चय पक्का था तो ईश्वर भी मददगार हो गया। कुछ दिनों बाद मैंने घर वालों को और वाराणसी निवासी अपने चाचा को अपने फैसले के बारे में बताया। घर वाले तो बहुत नाराज हुए लेकिन चाचा ओम प्रकाश रावत ने मेरे मन की बात समझी।
चाचा ने वापस नहीं बुलाया कि कहां मुंबई में धक्के खा रहे हो?
वह चार पांच दशकों से वाराणसी के काशी में हैं। विश्वनाथ मंदिर में शिव की पूजा आराधना करते हैं। वही मुझे मेरे पैतृक गांव मध्यप्रदेश में सागर जिले के लालोई से बाहर लेकर आए। उन्होंने ही शिक्षित भी किया और दीक्षित भी। मेरे जीवन को ढालने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।