कश्मीर में आतंक के सफाए के साथ-साथ भारतीय सेना ग्रामीण स्तर पर आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की जिंदगी भी संवार रही है। समय-समय पर लोगों की मदद की जाती है। उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित किया जाता है। कई दशकों से सेना ऐसे प्रयास कर रही है जिनसे आवाम और जवानों के बीच की दूरियां कम हो सकें।
आतंक के सफाए के साथ लोगों का जीवन भी संवार रही सेना, बदल गई दृष्टिबाधित भाई-बहनों की जिंदगी
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हाल ही में सेना की ओर से किए गए एक काम की मिसाल उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले से भी सामने आई है। भारतीय सेना बांदीपोरा जिले के एक छोटे से गांव गुंडपुरा के तीन भाई-बहनों के लिए फरिश्ता बनकर आई। 28 वर्षीय मुंतजिर नजार और उसके भाई-बहन जन्म से ही आंखों की रोशनी से वंचित हैं। लेकिन यह अक्षमता मुंतजिर और उसके भाई-बहन को जिंदगी में अपना सपना साकार करने से नहीं रोक सकी। मुंतजिर ने आंखों की रोशनी की कमी को सुर और ताल ने पूरा किया है और उसने संगीत को अपनाया है।
वर्ष 2011 में सेना की नजर इन भाई-बहनों पर पड़ी और उन्होंने उनकी मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया। मुंतजिर का परिवार एक नदी के किनारे रहता है जिसे पार करने में बेहद मुश्किल आती थी। इसे देखते हुए सेना ने इस परिवार के लिए एक फुट ब्रिज बनाया।
मुंतजिर की संगीत के प्रति रुचि को देख सेना ने उसे एक इलेक्ट्रॉनिक की-बोर्ड भी दिया। इस पर लगन और मेहनत से मुंतजिर ने संगीत को अपनाया। मुंतजिर के अनुसार उसकी संगीत में काफी रुचि थी, जिसे आगे बढ़ाने के लिए सेना ने उसकी काफी मदद की।
सेना की मदद से अब मुंतजिर अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है। अब वह संगीत की रुचि रखने वाले 10 से ज्यादा युवाओं को भी संगीत का प्रशिक्षण दे रहा है।