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Sunlight: विटामिन-डी ही नहीं, डिमेंशिया से बचे रहने के लिए भी जरूरी है धूप; रिसर्च में खुलासा

Fri, 26 Jun 2026 05:06 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Fri, 26 Jun 2026 05:06 PM IST
सार

जो लोग कम रोशनी वाली जगहों में या अक्सर घर के अंदर रहते हैं, उनमें डिमेंशिया होने का खतरा ज्यादा देखा गया है। सूरज की रोशनी वाली जगहों पर जाने से यह खतरा 15 से 25 प्रतिशत तक कम हो सकता है।

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1.5 hours per day in daylight is associated with lower risk of dementia sunlight kyu jaruri hai
विटामिन-डी क्यों जरूरी है? - फोटो : Amarujala.com/AI

दुनिया की बड़ी आबादी विटामिन-डी की कमी और इसके कारण होने वाली समस्याओं का शिकार है। अनुमान है कि दुनियाभर में करीब 1 अरब लोगों में इसकी कमी है, जिससे उनमें हड्डी की बीमारियों, ऑटोइम्यून बीमारी और संक्रामक रोगों का खतरा बना हुआ है। सूर्य की रोशनी से आसानी से इसकी पूर्ति हो सकती है, फिर भी लोगों में इस जरूरी पोषक तत्व की कमी देखी जा रही है।



क्या आप जानते हैं विटामिन-डी की कमी से सिर्फ हड्डियां कमजोर नहीं होतीं, बल्कि इससे डिमेंशिया का भी खतरा हो सकता है?

वैश्विक स्तर पर पता चलता है कि मौजूदा समय में दुनिया डिमेंशिया जैसी बीमारियों की चुनौती का सामना कर रही है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता, फैसले लेने की ताकत और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

अब तक इसके पीछे उम्र, आनुवंशिक कारण, मोटापा, शराब, सिर की गंभीर चोट और कई अन्य जोखिम कारकों की बात होती रही है। लेकिन अब विशेषज्ञों ने पाया है कि जो लोग पर्याप्त मात्रा में धूप नहीं रहते हैं, उनमें भी डिमेंशिया होने का खतरा अधिक देखा जाता रहा है।

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डिमेंशिया का खतरा - फोटो : Freepik.com

विटामिन-डी की कमी से  डिमेंशिया का जोखिम

हम सभी जानते हैं कि विटामिन-डी की कमी दूर करने के लिए धूप में समय बिताना जरूरी होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यही धूप आपके दिमाग को भी लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकती है?

नई रिसर्च कुछ ऐसा ही संकेत दे रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग धूप में समय बिताते हैं, उनमें आगे चलकर डिमेंशिया की बीमारी होने का खतरा कम हो सकता है।
 

  • अध्ययन में सामने आया है कि दिनभर अंधेरे या कम रोशनी वाले कमरों में रहने वाले लोगों में डिमेंशिया का खतरा ज्यादा हो सकता है। वहीं, जिन्होंने अपनी दिनचर्या का कुछ हिस्सा धूप में बिताया उनमें यह खतरा 15 से 25 प्रतिशत तक कम देखा गया। 


चीन के विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ये अध्ययन किया। इसके लिए करीब  87,600 लोगों पर आठ साल तक नजर रखी गई। सभी प्रतिभागियों की औसत उम्र 62 साल थी।

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रोशनी और डिमेंशिया का लिंक - फोटो : Freepik.com

अध्ययन में क्या पता चला?

शोध के दौरान प्रतिभागियों ने कलाई में एक खास इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस (एक्टिग्राफी डिवाइस) पहनाई गई। इसमें दो सेंसर लगे थे
 

  • लाइट सेंसर, जो यह रिकॉर्ड करता था कि व्यक्ति दिनभर कितनी और कैसी रोशनी में रहा।
  • एक्सेलेरोमीटर, जो शरीर की गतिविधियों और मूवमेंट को मापता है। यानी व्यक्ति कितना चला-फिरा, उसकी गति कितनी बदली और शरीर कितना सक्रिय रहा।


आठ साल के इस अध्यन के दौरान 741 लोगों को डिमेंशिया हो गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग ज्यादातर समय घर या दफ्तर जैसी कम रोशनी वाली जगहों पर रहते थे, उनमें शुरुआत से ही डिमेंशिया का खतरा ज्यादा था। लेकिन जब ऐसे लोग ज्यादा उजाले वाले माहौल में रहने लगे, तो उनका जोखिम 15 से 25 प्रतिशत तक घट गया।

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धूप में समय बिताना जरूरी - फोटो : Freepik.com

डिमेंशिया का खतरा बढ़ाने वाली स्थितियां

जिन लोगों को दिन में औसतन 1,000 लक्स  या उससे ज्यादा रोशनी मिली, उनमें डिमेंशिया का खतरा कम रोशनी पाने वालों की तुलना में 16 प्रतिशत कम था।
 

  • लक्स रोशनी की तीव्रता मापने की इकाई है। लगभग 1,000 लक्स का मतलब है अच्छी इनडोर लाइट या बादलों वाले दिन की बाहरी रोशनी।


शोध में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। अगर किसी व्यक्ति को दिन में  0.7 घंटे (करीब 42 मिनट) से भी कम तेज रोशनी मिली, तो यह डिमेंशिया का कारण बनने वाली स्थितियों जैसे मोटापा, शराब का सेवन और सिर में गंभीर चोट की तरह खतरनाक हो सकता है।

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ब्रेन को कैसे कैसे रखें हेल्दी - फोटो : Adobe Stock

क्या कहते हैं शोधकर्ता?

शोधकर्ताओं के अनुसार, रोशनी हमारे शरीर की सर्केडियन रिद्म को नियंत्रित करती है।

इसे आसान भाषा में समझें तो यह हमारे शरीर की 24 घंटे चलने वाली प्राकृतिक जैविक घड़ी है, जो यह तय करती है कि हमें कब जागना है, कब नींद आएगी, शरीर कब सबसे ज्यादा सक्रिय रहेगा और दिमाग कब बेहतर तरीके से काम करेगा। यही व्यवस्था हमारी याददाश्त, सीखने की क्षमता और सोचने-समझने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि पहले किए गए कई ब्रेन स्कैन अध्ययनों में देखा गया है कि डिमेंशिया होने पर दिमाग के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से धीरे-धीरे सिकुड़ने लगते हैं। इस अध्ययन से संकेत मिलता हैं कि अगर दिन के समय पर्याप्त रोशनी मिले, तो दिमाग के इन हिस्सों के सिकुड़ने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है।



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स्रोत:
Associations between wearable-device-measured daytime and nighttime light exposures and dementia risk: A prospective cohort study


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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