क्या आपको भी छोटी-छोटी चीजें भूलने लगी हैं, लोगों का नाम-रोजाना के काम तक भी याद नहीं रहते? अगर हां, तो ये चेतावनी है कि आपको अलर्ट हो जाना चाहिए। लाइफस्टाइल और खान-पान की गड़बड़ी ने ब्रेन हेल्थ को तो काफी नुकसान पहुंचाया ही है साथ ही अब विशेषज्ञ इन बढ़ती समस्याओं के लिए पर्यावरणीय कारकों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं।
Health Alert: नाम और काम भूलना हो गया है आम? रिसर्च ने खोला दिमाग को डिस्टर्ब करने वाली समस्या का राज
वायु प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों और दिल की बीमारी का मसला नहीं रहा, बल्कि यह सीधे दिमाग को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे लोगों में याददाश्त से संबंधित समस्याएं भी बढ़ने लगी हैं।
प्रदूषण से फेफड़ों के साथ दिमाग को भी खतरा
बढ़ते वायु प्रदूषण को आमतौर पर फेफड़े और सांस से संबंधित बीमारियों को बढ़ाने वाला माना जाता रहा है। हालांकि अब वैज्ञानिकों ने सावधान किया है कि प्रदूषण आपकी याददाश्त क्षमता पर भी बुरी तरह से असर डाल रहा है।
- वायु प्रदूषण एक जटिल पर्यावरणीय कारक के रूप में उभरा है जो श्वसन स्वास्थ्य से कहीं अधिक चीजों को प्रभावित करता है।
- वैज्ञानिक अनुसंधान महीन कणों, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य वायुजनित प्रदूषकों के संपर्क में रहने वाले लोगों में मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक समस्याओं के खतरे को लेकर सावधान किया है।
- अध्ययन में शोधकर्ताओ ने पाया है कि प्रदूषित हवा दिमाग में यादों को स्टोर रखने की क्षमता और विचार एवं व्यवहार से जुड़े तंत्रिका मार्गों को प्रभावित कर रही है।
याददाश्त से संबंधित दिक्कतों का खतरा
अध्ययनकर्ताओं ने साफ किया है कि वायु प्रदूषण को सिर्फ फेफड़ों की समस्याओं को बढ़ाने वाला नहीं माना जाना चाहिए, इसके साइड-इफेक्ट्स और भी खतरनाक हो सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां वायु प्रदूषण बड़ी चुनौती रहा है वहां लोगों की दिमागी सेहत में गड़बड़ी को लेकर विशेष सावधान रहने की सलाह दी गई है।
वायु प्रदूषण के दिमागी क्षमता और याददाश्त पर असर को समझने के लिए विशेषज्ञों ने व्यापक अध्ययन किया।
- साल 2000 से 2018 के बीच 65 वर्ष से अधिक उम्र के 2.78 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया।
- अध्ययन में स्पष्ट संकेत मिले कि जो लोग लंबे समय तक पीएम2.5 के संपर्क में रहे उनमें याददाश्त और संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट देखी गई।
अल्जाइमर-डिमेंशिया का भी हो सकते हैं शिकार
डब्ल्यूएचओ के अनुसार सालाना औसत पीएम 2.5 का स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह इससे कई गुना ज्यादा है। वायु प्रदूषण से याददाश्त तो कमजोर होता है ही साथ ही लंबे समय में इसके कारण ब्रेन से संबंधित कई अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं।
- जिनका मस्तिष्क पहले से कमजोर था, उनके लिए जहरीली हवा और भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती है।
- जिन इलाकों में यह अध्ययन किया गया, वहां पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना था।
- यहां रहने वाले लोगों में अल्जाइमर और डिमेंशिया का मामलों में भी तेजी से वृद्धि रिपोर्ट की गई।
गर्भ में पल रहे शिशु को भी खतरा
वायु प्रदूषण के जोखिम कई तरह से गंभीर हो सकते हैं। अमर उजाला में इससे संबंधित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि बढ़ता प्रदूषण गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी खतरनाक हो सकता है। दूषित माहौल में रहने वाली गर्भवती महिलाओं में समय से पहल प्रसव, जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने साथ ही शिशु में हृदय रोगों का खतरा बढ़ने तक का खतरा हो सकता है।
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स्रोत:
Air quality improvement and cognitive decline in community-dwelling older women in the United States: A longitudinal cohort study
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