मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं दुनियाभर में तेजी से बढ़ती देखी जा रही हैं। बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक सभी इसका शिकार देखे जा रहे हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में लगभग 8 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की मेंटल हेल्थ समस्या से जूझ रहा है। ये 100 करोड़ से अधिक का आंकड़ा हो सकता है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का असर शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है, ऐसे लोगों में दिल की बीमारियों, मोटापा और क्रॉनिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा अधिक हो सकता है।
Mental Health Issues: ग्लोबल मेंटल हेल्थ इंडेक्स में 60वें स्थान पर भारत, रिपोर्ट में सामने आईं चिंताजनक बातें
Global Mind Health 2025 report: ग्लोबल माइंड हेल्थ इंडेक्स में भारत के युवाओं की 60वीं रैंकिंग आई है। इसस पता चलता है कि देश में मेंटल हेल्थ की समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। फोकस और स्ट्रेस मैनेजमेंट में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है जिसको लेकर सभी लोगों को अलर्ट रहना चाहिए।
भारतीय युवाओं का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य
ग्लोबल माइंड हेल्थ इंडेक्स की रिपोर्ट और चुनौतियों को जानने से पहले गौरतलब है कि बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सीधा असर किसी भी देश की उत्पादकता और इकॉनमी पर भी पड़ता है। डब्ल्यूएचओ कहता है, मेंटल हेल्थ की बढ़ती दिक्कतों की वजह से प्रोडक्टिविटी के नुकसान होता है। इससे ग्लोबल इकॉनमी को हर साल लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होता है।
- मेंटल हेल्थ को लेकर चौंकाने वाली नई ग्लोबल रिपोर्ट ने भारतीय युवाओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।
- अमेरिका की सैपियन लैब्स की ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 18-34 साल के युवाओं का माइंड हेल्थ कोशेंट (एमएचक्यू) स्कोर सिर्फ 33 था। ये ओवरऑल मेंटल वेल-बीइंग में 84 देशों में से 60वें नंबर है।
- माइंड हेल्थ कोशेंट की मदद से मानसिक स्वास्थ्य और बौद्धिक कार्यप्रणाली का आकलन किया जाता है।
ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025 रिपोर्ट: 10 प्वाइंट्स में समझिए सबकुछ
- ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025 वैश्विक स्तर पर की गई महत्वपूर्ण स्टडी है। इसमें 84 देशों में मेंटल हेल्थ का आकलन किया गया।
- भारत में 18 से 34 साल के युवाओं में माइंड हेल्थ कोशेंट का कम होना यहां बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को दिखाता है।
- इसके उलट, ज्यादा उम्र के लोगों (55 और उससे ज़्यादा) ने एमएचक्यू पर 96 स्कोर किया और 49वें स्थान पर रहे।
- एमएचक्यू को कॉग्निटिव, इमोशनल, सोशल और फिजिकल क्षमताओं की एक बड़ी रेंज को मापने के लिए डिज़ाइन किया गया है। जो किसी व्यक्ति की ज़िंदगी, काम और रिश्तों को संभालने की क्षमता पर असर डालती हैं।
- विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय युवाओं में यह चिंताजनक ट्रेंड एंग्जायटी या डिप्रेशन के मामलों से कहीं ज्यादा है। यह इमोशनल हेल्थ, फोकस, लचीलापन और सोशली जुड़ाव जैसे मेंटल हेल्थ के बुनियादी गुणों में भी गिरावट को दिखाता है।
- लाइफस्टाइल में बदलाव, कम उम्र में ही मोबाइल-लैपटॉप जैसे स्क्रीन से जुड़ाव, खान-पान में गड़बड़ी और परिवार के लोगों से भावनात्मक सपोर्ट न मिल पीने के वजह से ये समस्या बढ़ती जा रही है।
- विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना महामापी के बाद दौर में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी शिकायतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जिसमें खासतौर पर एंग्जायटी डिसऑर्डर और डिप्रेशन के मामलों में इजाफा हुआ है।
- रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि भारतीय युवाओं में नींद की कमी, सोशल आइसोलेशन, बर्नआउट सिंड्रोम जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
- विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए समय पर काउंसलिंग, लाइफस्टाइल सुधार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और सोशल सपोर्ट सिस्टम को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
- मेंटल हेल्थ की समस्याओं पर समय रहते ध्यान न दिया गया या इसमें सुधार न हुआ तो इससे देश की उत्पादकता पर भी असर हो सकता है।
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स्रोत
GLOBAL MIND HEALTH IN 2025
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