मेडिकल साइंस में क्रांति, जागरूकता अभियान, नई दवाओं और टीकों ने कई बीमारियों पर विजय प्राप्त करने में मदद की है। भारत कई रोगों से पहले से ही मुक्त घोषित है और कुछ के खिलाफ लड़ाई आखिरी चरण में है। भारत ने करीब 15 साल पहले, एक समय सबसे बड़ी चिंता का कारण रहे पोलियो रोग पर फतह हासिल की थी। 13 जनवरी, 2011 पश्चिम बंगाल के हावड़ा में आखिरी बार पोलियो का मामला सामने आया था। इसे तीन साल बाद तक कोई भी नया केस सामने न आने के बाद, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 27 मार्च, 2014 को भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो-मुक्त घोषित कर दिया था।
Explainer: 15 साल की मेहनत पर फिर जाएगा पानी, क्या भारत में फिर लौट रही बच्चों को अपंग बनाने वाली बीमारी?
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सीवेज के सैंपल में वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस टाइप-1 मिलने की खबर ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान फिर इस वायरस की ओर खींच दिया है। 13 जनवरी, 2011 को आखिरी बार भारत में पोलियो का केस सामने आया था। इसके बाद भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया गया।
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इस खबर के सामने आने के बाद से कई तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं। क्या भारत फिर से इस खतरनाक बीमारी की चपेट में आने वाला है, क्या 15 साल पहले इस रोग पर मिला जीत का तमगा छिनने वाला है? आइए इसे समझते हैं।
पहले जानिए कैसे मिला पोलियो का सैंपल?
स्वास्थ्य विभाग पोलियो वायरस की निगरानी के लिए हर महीने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के एसटीपी के दूषित पानी के नमूने जांच के लिए भेजता है। हाल ही में डूंडाहेड़ा एसटीपी से भेजे गए सैंपल की जांच में वीडीपीवी टाइप-1 की पुष्टि हुई।
- शहरी पीएचसी के नोडल अधिकारी डॉ. आरके गुप्ता ने बताया कि गठित 107 टीमें घर-घर जाकर बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी लेंगी। विशेष रूप से एसटीपी के आसपास की कॉलोनियों में पांच वर्ष तक के बच्चों का सर्वे कर बीमार बच्चों का पता लगाया जाएगा।
- टीकाकरण की स्थिति का भी आकलन किया जाएगा।
केवल दो देशों में सबसे ज्यादा एक्टिव है ये वायरस
अधिकारियों का कहना है कि पोलियो वायरस का कारण नियमित टीकाकरण न होना भी हो सकता है। हालांकि सैंपल में वायरस की पुष्टि का मतलब यह नहीं है कि भारत में पोलियो फिर से फैल गया है, लेकिन यह संकेत जरूर है कि निगरानी और टीकाकरण कार्यक्रमों को लगातार मजबूत बनाए रखना जरूरी है।
- मौजूदा समय में दुनिया में पोलियो मुख्य रूप से केवल दो देशों- पाकिस्तान और अफगानिस्तान में ही लगातार पाया जाता है।
- फिर भी अंतरराष्ट्रीय यात्रा, टीकाकरण कवरेज में कमी और वायरस के बदलते स्वरूप के कारण दूसरे हिस्सों में भी खतरा लगातार बना रहता है।
पोलियोवायरस को लेकर सबसे बड़ा डर ये रहता है कि ये शरीर में चुपचाप प्रवेश करता है। कई बार संक्रमित व्यक्ति को कोई गंभीर लक्षण भी नहीं दिखते। वायरस नर्वस सिस्टम पर अटैक कर स्थाई रूप से लकवा का कारण बन सकता है। सबसे अधिक खतरा पांच साल से कम उम्र के बच्चों में देखा जाता है।
पोलियो रोग और उसके खतरे
पोलियो मुख्य रूप से फीकल-ओरल रूट यानी संक्रमित मल के संपर्क से फैलता है। यदि किसी व्यक्ति के मल से दूषित पानी या भोजन का सेवन किया जाए, तो वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है।संक्रमित व्यक्ति के मल में वायरस कई सप्ताह तक मौजूद रह सकता है। यही कारण है कि सीवेज सर्विलांस (मलजल निगरानी) को पोलियो नियंत्रण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
- गाजियाबाद के सीवेज नमूने में वायरस की पहचान भी इसी निगरानी प्रणाली के कारण संभव हुई।
- बच्चे अक्सर जमीन, खिलौनों या दूषित वस्तुओं के संपर्क में आते हैं और फिर बिना हाथ धोए भोजन कर लेते हैं। इसलिए छोटे बच्चों में संक्रमण का जोखिम अधिक होता है।
- खराब स्वच्छता व्यवस्था और साफ पेयजल की कमी वाले क्षेत्रों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है।
- पोलियो से बचाव के लिए इसके टीकों को सबसे प्रभावी माना जाता है। भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों को पोलियो की मुफ्त खुराक पिलाई जाती रही है।
पोलियो के खतरे को कैसे कम करें?
'दो बूंद जिंदगी के' नाम से चलाए गए पोलियो वैक्सीनेशन कैंपेन की मदद से भारत ने इस खतरनाक बीमारी को नियंत्रित करने में सफलता पाई है।
- विशेषज्ञों के अनुसार पोलियो वैक्सीन लाखों बच्चों को स्थायी विकलांगता से बचाने में सफल रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि भले ही पोलियो का मामला न दिखे, फिर भी टीकाकरण कार्यक्रम जारी रहना चाहिए।
- इसके अलावा साफ पानी पीना, खाने से पहले और शौचा के बाद साबुन से हाथ धोना, बच्चों को स्वच्छ वातावरण देना और सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।
- वैक्सीन कवरेज में थोड़ी भी कमी वायरस को फिर से फैलने का मौका दे सकती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।