लाइफस्टाइल और आहार में गड़बड़ी के कारण दुनियाभर में कई तरह की बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसका शिकार देखे जा रहे हैं। अमर उजाला में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में हमने बताया कि किस तरह से मोटापे की स्थिति को स्वास्थ्य विशेषज्ञ तेजी से बढ़ती महामारी के रूप में देख रहे हैं। इससे एक-दो नहीं 60 से अधिक तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
Epilepsy: मिर्गी को आप भी तो नहीं मानते हैं भूत-प्रेत की समस्या? जानिए इस रोग के बारे में सबकुछ आसान भाषा में
International Epilepsy Day 2026: मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को अक्सर गलत धारणाओं, अंधविश्वास और सामाजिक कलंक के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अक्सर लोग इसे भूत-प्रेत शैतानी समस्या मान लेते हैं। आयुष मंत्रालय ने रोगियों के लिए जागरूकता, समझ और सामाजिक समावेश पर जोर दिया है।
मिर्गी रोग और अंधविश्वास
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को अक्सर गलत धारणाओं, अंधविश्वास और सामाजिक कलंक के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भारत में ज्यादातर लोग मिर्गी के मरीजों को अक्सर पाप या भूत-प्रेत शैतानी समस्या से जोड़कर देखते हैं। इसके कारण रोगियों को सामाजिक भेदभाव का तो सामना करना ही पड़ता है साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है।
- मिर्गी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें दौरे पड़ते हैं। इस दौरान पीड़ित व्यक्ति हाथ-पैर झटक सकता है, मुंह से झाग आ सकता है, और आंखें ऊपर की ओर चढ़ सकती हैं।
- इसके कारण दौरे पड़ने, असामान्य व्यवहार, संवेदनाओं में कमी और कभी-कभी बेहोशी की समस्या भी हो सकती है।
- स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मिर्गी के इलाज के लिए झाड़-फूंक और अंधविश्वास के चक्करों में पड़ने से बचना चाहिए। दवाइयों और उपचार के अन्य माध्यमों से इसे ठीक किया जा सकता है।
आयुष मंत्रालय ने जागरूकता बढ़ाने पर दिया जोर
अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस के अवसर पर भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने रोगियों के लिए जागरूकता, समझ और सामाजिक समावेश पर जोर दिया है। मंत्रालय ने अपील की है कि समाज मिलकर मिर्गी से जुड़े कलंक को कम करे और सूचित, सहानुभूतिपूर्ण बातचीत को बढ़ावा दे।
- देश के कई हिस्सों में सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से यह समस्या और मुश्किल हो जाती है। कई लोग मिर्गी को बुरी आत्माओं का प्रभाव, पिछले जन्म के पाप या अलौकिक शक्तियों से जोड़ते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को गलत उपचार, हानिकारक प्रथाओं और कलंक झेलना पड़ता है।
- यही नहीं, मिर्गी शिक्षा, रोजगार, विवाह और सामाजिक जीवन पर बुरा असर डालती है। रोजगार के मामले में स्थिति बहुत चिंताजनक है।
रोगियों पर बेरोजगारी की मार
केरल के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मिर्गी से पीड़ित 58 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, जबकि सामान्य लोगों में यह आंकड़ा सिर्फ 19 प्रतिशत तक था।
नियोक्ता अक्सर ऐसे लोगों को नौकरी देने से भी हिचकिचाते हैं। दौरे पड़ने पर सामाजिक कलंक बढ़ता है, जिससे व्यक्ति को कम वेतन वाली नौकरी या बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में नौकरी छूट जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ शिक्षा और सामाजिक स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन मिर्गी के प्रति धारणा, कलंक और भेदभाव में खास बदलाव नहीं आया। इससे अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं।
पुरुषों में मिर्गी का जोखिम अधिक
इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन के प्रयासों से भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि मिर्गी को मानसिक बीमारी नहीं माना जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि मिर्गी के बोझ को कम करने के लिए जागरूकता जरूरी है। इसमें बेहतर देखभाल, रोकथाम, जन जागरूकता अभियान और मौजूदा कार्यक्रमों में मरीजों की देखभाल को शामिल करना शामिल है।
मिर्गी किसी को भी हो सकती है, लेकिन आमतौर पर छोटे बच्चों और बुजुर्गों में इसका जोखिम अधिक होता है। साल 2021 में प्रकाशित शोध के अनुसार, महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मिर्गी का जोखिम अधिक देखा गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मिर्गी से पीड़ित लगभग आधे से अधिक लोगों में इसका कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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