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Sleeping Trouble: जंक फूड छीन रहा है आपकी नींद, अध्ययन से हुआ खुलासा- क्यों गहरी नींद में नहीं सो पाते लोग
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवानी अवस्थी
Updated Wed, 24 Apr 2024 11:49 AM IST
सार
कई शोध बताते हैं कि हम जो भी खाते हैं, उसका सीधा असर हमारी नींद पर पड़ता है। इसलिए यदि आप शर्करा युक्त पेय, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज और मसालेदार भोजन का अधिक सेवन करती हैं तो रात में बार-बार करवटें बदलने को मजबूर हो सकती हैं।
स्वाद ठीक लगा तो बार-बार बाहर से मंगाया। घर से बाहर निकले तो ‘जंक फूड’ जरूर खाया। दोस्तों के साथ पार्टी की तो भी जंक फूड आया। जंक फूड से दोस्ती कहीं आपकी नींद में जंग न लगा दें, क्योंकि पूरी दुनिया में वैज्ञानिक इस बात पर एकमत हैं कि जंक फूड लोगों की नींद छीन रहा है।
ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी की एक हालिया रिपोर्ट ने महिलाओं की नींद उड़ा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अनिद्रा का जोखिम 40 फीसदी अधिक होता है। इससे पहले भी ब्रिटेन की ही प्रसूति चिकित्सा की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि गर्भावस्था के दौरान 94 फीसदी गर्भवती महिलाओं की नींद का चक्र बिगड़ जाता है।
दरअसल, जिनको देर से नींद आती है या फिर बार-बार नींद टूट जाती है, उनको मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की समस्या तो हो ही सकती है, लेकिन ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि ऐसे महिला-पुरुष को कभी गहरी नींद नहीं आती है, जो कि बेहद जरूरी है। कई शोध बताते हैं कि हम जो भी खाते हैं, उसका सीधा असर हमारी नींद पर पड़ता है। इसलिए यदि आप शर्करा युक्त पेय, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज और मसालेदार भोजन का अधिक सेवन करती हैं तो रात में बार-बार करवटें बदलने को मजबूर हो सकती हैं।
वैज्ञानिक और कई शोध यह बता चुके हैं कि जंक फूड का सेवन हमारी गहरी नींद की गुणवत्ता को काफी हद तक प्रभावित करता है। नींद के मुख्य रूप से पांच चरण होते हैं, जिनमें तीसरा चरण गहरी नींद है, जिसे स्लो-वेव स्लीप या नॉन-रैपिड आई मूवमेंट (एनआरईएम) के रूप में जाना जाता है। यह नींद चक्र का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, क्योंकि इसमें ही हमें सबसे ज्यादा आरामदायक नींद आती है। नींद का यह चरण ठीक न होने से हमें कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं।
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जंक फूड का नींद पर प्रभाव
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अध्ययन बताता है
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित होने वाली ‘ओबेसिटी’ पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ। यह अध्ययन स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था। इसमें बताया गया कि नींद बहुत ही गतिशील होती है और इसके कई चरण होते हैं। इन चरणों में मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार की विद्युत गतिविधियां होती हैं। नींद का सबसे महत्वपूर्ण चरण गहरी नींद (धीमी नींद) है। यह हार्मोन के स्राव के साथ कुछ पहलुओं को भी नियंत्रित करती है, जैसे कि आपकी नींद कितनी आरामदायक होगी।
गहरी नींद मांसपेशियों, हड्डियों और ऊतकों के निर्माण के साथ उनकी मरम्मत में भी मदद करती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। गहरी नींद आपकी मानसिक गतिविधियों और याददाश्त को बढ़ाने का काम करती है। अध्ययन के दौरान अध्ययनकर्ताओं ने उन प्रतिभागियों की गहरी नींद में धीमी तरंग गतिविधि पाई, जिन्होंने जंक फूड खाया था, जबकि स्वास्थ्यवर्धक आहार खाने वाले लोगों को आरामदायक गहरी नींद आई। वहीं, जंक फूड खाने वालों को कम गहरी नींद आई। इससे यह साबित होता है कि जंक फूड का सेवन बढ़ने से नींद की गुणवत्ता पर गहरा असर होता है।
कितना सोना है जरूरी
गहरी नींद मस्तिष्क से अपशिष्ट उत्पादों को हटाकर उसे स्वस्थ रखने में मदद करती है। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, नींद के पैटर्न में बदलाव आते हैं। समय के साथ नींद की मात्रा और गुणवत्ता में कमी आती है। गहरी नींद न लेने से आपको मानसिक परेशानियां हो सकती हैं और कई अन्य विकार भी घेर सकते हैं।
तो क्या बहुत अधिक नींद लेने से कोई समस्या नहीं होगी? कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ताओं ने 5 लाख वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया, जिसमें पाया कि अत्यधिक नींद लेना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर एजिंग’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, सात घंटे की नींद वयस्कों के लिए सर्वोत्तम है। जो लोग अधिक या कम सोते हैं, वे एंग्जायटी और डिप्रेशन का अधिक शिकार होते हैं।
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कितने घंटे सोना चाहिए
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उम्र के हिसाब से
नवजात शिशु को 14 से 17 घंटे की नींद की आवश्यकता होती है। इससे बच्चे का विकास ठीक ढंग से होता है।
एक से दो साल के बच्चे को 11 से 14 घंटे सोना चाहिए। तीन से पांच साल के बच्चे लर्निंग फेज में होते हैं। ऐसे में उन्हें 10 से 13 घंटे तक सोना चाहिए।
6 से 12 साल के बच्चों को 9-12 घंटे की नींद लेनी चाहिए, क्योंकि इस दौरान उनके शरीर का विकास होता है और लंबाई भी बढ़ रही होती है।
13 से 18 साल के बच्चों में किशोरावस्था एक ऐसा समय होता है, जब पढ़ाई का दबाव उन पर सबसे ज्यादा रहता है। ऐसे में सही विकास के लिए उन्हें 8 से 10 घंटे की नींद की जरूरत होती है।
18 से 64 साल तक के वयस्कों का अधिकतर समय काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच बीतता है और तनाव भी अधिक होता है, इसलिए उन्हें 7 से 9 घंटे तक सोना चाहिए।
64 साल से अधिक उम्र में काम करने की क्षमता कम हो जाती है और ऊर्जा की अधिक जरूरत होती है। कई लोग तो शारीरिक समस्याओं से भी जूझते हैं और उनके लिए ठीक से चल पाना भी मुश्किल होता है। ऐसे में उन्हें 7 से 8 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए।
पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम
अमेरिका से प्रकाशित होने वाले जर्नल ऑफ क्लीनिकल स्लीप मेडिसिन में छपे एक अध्ययन में यह पाया गया कि कम फाइबर, अधिक सैचुरेटेड फैट और अधिक शर्करा युक्त खाने से हल्की, पूरा आराम न देने वाली और बार-बार टूटने वाली नींद आती है। इसके नतीजे बताते हैं कि अधिक फाइबर का सेवन करने वाले लोगों को गहरी नींद आती है।
अध्ययन में पाया गया कि जब प्रतिभागियों ने कम सैचुरेटेड फैट और अधिक प्रोटीन वाले भोजन का सेवन किया तो उन्हें जल्दी नींद आ गई और वे लंबे समय तक सोए रहे। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन की रिपोर्ट बताती है कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए आपको ऐसी जीवन-शैली को चुनना चाहिए, जो स्वास्थ्यवर्धक नींद को बढ़ाएं। इसके लिए आपको पौष्टिक आहार का सेवन और नियमित व्यायाम करना चाहिए। वहीं, पर्याप्त नींद न लेने से आपको उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय संबंधी रोग होने की आशंका बढ़ जाती है।
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दुनियाभर में औसतन नींद
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आंकड़ों में जानें
अमेरिकन जर्नल ऑफ मैनेज्ड केयर 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल अमेरिका में 30 से 40 फीसदी वयस्क सालाना अनिद्रा को लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं। नीदरलैंड के फिलिप्स ग्लोबल स्लीप सर्वे के अनुसार, दुनिया भर में 62 फीसदी वयस्कों का कहना है कि उन्हें उतनी अच्छी नींद नहीं आती, जितनी वे चाहते हैं। वहीं दुनिया भर में 44 फीसदी वयस्कों का कहना है कि पिछले पांच सालों में उनकी नींद की गुणवत्ता खराब हुई है।
अमेरिका में 9 से 21 फीसदी महिलाओं और 24 से 31 फीसदी पुरुषों को ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया है, यानी नींद लेते हुए सांस लेने में रुकावट आती है। सोते समय खर्राटे लेना भी ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया का ही एक संकेत होता है। अमेरिका में लगभग 57 फीसदी पुरुष और 40 फीसदी महिलाएं खर्राटे लेती हैं।
दुनिया भर में क्या है स्थिति
कोरिया और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने स्मार्टवॉच और सर्वेक्षण के माध्यम से 11 देशों में 30,000 से अधिक महिला-पुरुषों की नींद की आदतों की निगरानी की। इसके नतीजों से पता चला कि केवल फिनलैंड में रहने वाले लोग ही औसतन 8 घंटे की नींद ले पाते हैं, जबकि जापान के लोग सबसे कम सोते हैं। वे 7 से भी कम घंटे सो पाते हैं, लगभग 6 घंटे 51 मिनट।
अमेरिका में लोगों के सोने का औसत लगभग साढ़े 7 घंटे है। वे हर रात 7 घंटे 34 मिनट सोते हैं, वहीं ब्रिटेन में लोगों को सोने के लिए 10 मिनट ही अतिरिक्त मिलते हैं। वे हर रात औसतन 7 घंटे 44 मिनट सोते हैं। जर्मनी में लोगों के सोने का औसत 7 घंटे 39 मिनट है। कनाडा में लोग 7 घंटे 38 मिनट सोते हैं। अमेरिका की फर्म ‘फिटबिट’ द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, जापान के बाद भारत के लोग नींद से सबसे ज्यादा वंचित हैं। भारतीय लोग केवल 7 घंटे 1 मिनट ही सो पाते हैं।
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जंक फूड का नींद पर प्रभाव
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‘स्लो वेव स्लीप’ पर होता है असर
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रभाकर भूषण मिश्रा बताते हैं, हमारे मस्तिष्क में कई तरह की तरंगे होती हैं, जिनके कारण हम दैनिक प्रतिक्रियाओं के साथ जागने और सोने का काम कर पाते हैं। जब हम गहरी नींद में होते हैं तो डेल्टा वेव का अनुपात काफी बढ़ जाता है और बीटा वेव का अनुपात कम हो जाता है, जिससे हम गहरी नींद सो पाते हैं। हम अगर जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन करते हैं तो यह इन्हीं तरंगों को प्रभावित करता है, जिससे नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
जंक फूड में कार्बोहाइड्रेट और सैचुरेटेड फैट अधिक मात्रा में होता है। यह हमारे मस्तिष्क में बीटा वेव तरंगों को बढ़ा देता है, जिससे हमें गहरी नींद नहीं आती है। जंक फूड स्लो वेव स्लीप की स्टेज को खत्म कर देता है। अच्छी नींद के लिए स्लो वेव स्लीप का होना जरूरी है। इस स्टेज में मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि, ग्रोथ हार्मोन का स्राव करती है। यह हार्मोन शरीर में जरूरत के हिसाब से मरम्मत करने का काम करता है। यह स्टेज जितनी ज्यादा देर तक रहती है, शरीर के लिए उतनी ही फायदेमंद होती है। यही कारण है कि जब भी हम गहरी नींद से जागते हैं तो तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करते हैं।
रात को हल्का और सुपाच्य भोजन
लखनऊ में केजीएमयू की सीनियर डाइटिशियन शालिनी श्रीवास्तव कहती हैं, जब भी हम जंक फूड खाते हैं तो इससे शरीर में मोटापा बढ़ने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर भी बढ़ जाता है। यह पाचन में भी आसान नहीं होता है। इससे कब्ज की समस्या होती है और हमारी स्लीप साइकिल प्रभावित होती है। आपको सबसे पहले अपने खाने में बदलाव करने की जरूरत है। आप जंक फूड का सेवन न करें और भरपूर मात्रा में पानी पीएं। खाने में नमक और चीनी का कम मात्रा में इस्तेमाल करें।
जब भी आपको भूख महसूस हो तो आप पानी, जूस या नारियल पानी पीएं। कई बार हमें जब भूख लगती है तो हमें पेय पदार्थ पीने की आवश्यकता होती है। आप नाश्ते में अंकुरित मूंग, चने की चाट बनाकर नींबू के रस के साथ खा सकती हैं। आप सलाद और फल को भी नाश्ते के बाद खा सकती हैं।
भारतीय भोजन, जैसे कि दाल, चावल, रोटी और सब्जी को प्राथमिकता दें। दोपहर के खाने के साथ आप दही या छाछ जरूर लें। आप शाम को भुने चने, मखाने और पॉप कॉर्न को शामिल कर सकती हैं। रात का खाना हल्का और सुपाच्य होना चाहिए। इसमें कम नमक का इस्तेमाल करें और सलाद जरूर लें। मल्टी ग्रेन आटे से बनी रोटी खाएं। खाने के बाद आधा घंटा जरूर टहलें। साथ ही सोने के एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर दें।
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