पहाड़ों की शांत वादियों वाले हिमाचल प्रदेश में इन दिनों विशेषज्ञ संक्रामक बीमारी के जोखिमों को अलर्ट कर रहे हैं। आदिवासी जिलों चंबा, किन्नौर और लाहौल-स्पीति में किए गए एक सामुदायिक सर्वे में सामने आया है कि पिछले एक साल के दौरान यहां हर पांच में से एक व्यक्ति ने यौन संचारित रोग (एसटीडी) से जुड़े लक्षणों की शिकायत की। ये अध्ययन जनजातीय विकास विभाग और शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) के सामुदायिक चिकित्सा विभाग ने मिलकर किया।
Himachal Pradesh: आदिवासी जिलों में इस संक्रामक बीमारी का अलर्ट, एचआईवी और कैंसर का बढ़ सकता है खतरा
हिमाचल प्रदेश के कई आदिवासी जिलों में एसटीडी संक्रमण के मामलों को लेकर अलर्ट किया गया है। ये संक्रमण मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त, संक्रमित सुई या कुछ मामलों में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मां से शिशु तक फैल सकते हैं।
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सर्वे में क्या पता चला?
विशेषज्ञ मानते हैं कि यौन स्वास्थ्य पर खुलकर बात न होना, सामाजिक झिझक और दूरदराज के इलाकों में सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं इस समस्या को और जटिल बना सकती हैं। कई लोग लक्षण होने के बावजूद जांच नहीं कराते, जिससे संक्रमण लंबे समय तक छिपा रह सकता है और दूसरों तक फैलने का खतरा भी बढ़ सकता है।
- इस सर्वे में 15 से 49 वर्ष की आयु के 3,000 लोगों को शामिल किया गया। सर्वे में शामिल लोगों में 54.3 प्रतिशत पुरुष और 45.7 प्रतिशत महिलाएं थीं।
- अध्ययन के अनुसार, कम से कम एक एसटीडी से जुड़े लक्षण की कुल व्यापकता 20 प्रतिशत पाई गई।
- तीनों जिलों में चंबा सबसे ऊपर रहा, जहां यह आंकड़ा 24.2 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसके बाद किन्नौर में 20.1 प्रतिशत और लाहौल-स्पीति में 15.7 प्रतिशत लोगों में ऐसे लक्षण सामने आए।
क्या है बढ़ते मामलों का कारण?
रिपोर्ट से साफ पता चलता है कि लोग यौन संचारित रोगों से बचाव के उपाय नहीं अपनाते हैं, जिस वजह से ये खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
- केवल 24.9 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्होंने यौन संबंध के दौरान कंडोम का इस्तेमाल किया था
- जबकि 33 प्रतिशत से अधिक लोगों ने बताया कि उन्होंने कंडोम का उपयोग कभी भी किया ही नहीं है।
- लोगों में एचआईवी और हेपेटाइटिस की जांच की दर भी काफी कम पाई गई। केवल 2 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ही जीवन में कभी इनकी स्क्रीनिंग कराई थी।
शोधकर्ताओं ने पाया कि लोगों में एसटीडी के बारे में सामान्य जानकारी तो कुछ हद तक मौजूद है, लेकिन बचाव और जोखिम से जुड़ी समझ में बड़ी कमी है। लगभग 72 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने एसटीडी का नाम सुना है, लेकिन सिर्फ 46.6 प्रतिशत लोगों को यह जानकारी थी कि कंडोम का इस्तेमाल संक्रमण के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ये निष्कर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अध्ययन ऐसे आदिवासी और भौगोलिक रूप से दूरस्थ जिलों में किया गया, जहां आबादी कम है और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच आसान नहीं है। किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे क्षेत्रों में कठिन पहाड़ी रास्ते, प्रतिकूल मौसम और सीमित चिकित्सा संसाधन, इन बीमारियों को लेकर शिक्षा और स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को लागू करना चुनौतीपूर्ण बना देते हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यौन स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना आज भी कई समुदायों में संवेदनशील विषय माना जाता है। इसी कारण लोग जानकारी लेने या डॉक्टर के पास जाने से हिचकिचाते हैं। नतीजतन, लक्षणों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, उनका इलाज नहीं हो पाता और कुछ मामलों में उन्हें सही तरीके से समझा भी नहीं जाता।
एसटीडी से एचआईवी और कैंसर का खतरा
अध्ययनों से पता चलता है कि जिन लोगों में एसटीडी की समस्या जैसे जननांगों में घाव, अल्सर या सूजन होती है, उनमें एचआईवी संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। त्वचा या सूजन वाले ऊतक एचआईवी वायरस के प्रवेश को आसान बना सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर एसटीडी मरीज को एचआईवी होगा, बल्कि यह जोखिम बढ़ाने वाला कारक है।
इसी तरह सभी एसटीडी कैंसर का कारण नहीं बनते, लेकिन कुछ मामलों में ये कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) का संक्रमण सर्वाइकल कैंसर का खतरा बढ़ाने वाला होता है। इसी तरह हेपेटाइटिस बी वायरस का संक्रमण लिवर कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।