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Alert: सिर्फ सिगरेट छोड़ना ही फेफड़ों को हेल्दी रखने के लिए काफी नहीं, ये चीजें भी कर सकती हैं लंग्स डैमेज

Sun, 05 Jul 2026 09:00 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sun, 05 Jul 2026 09:00 AM IST
सार

केवल सिगरेट छोड़ना ही नहीं, बल्कि उन अन्य जोखिमों को भी पहचानना जरूरी है जो रोजमर्रा की जिंदगी में अनजाने में हमारी सांसों पर हमला कर रहे हैं। आइए इस बारे में जान लेते हैं।

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फेफड़ों केलिए खतरे - फोटो : Adobe Stock

अगर आपसे पूछा जाए कि फेफड़ों को हेल्दी रखने के लिए सबसे जरूरी क्या है, तो ज्यादातर लोगों का जवाब होगा- सिगरेट छोड़ना। कई अध्ययन इस बात को साबित करते हैं कि धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और कई गंभीर श्वसन रोगों का सबसे बड़ा जोखिम कारक माना जाता है। पर बड़ा सवाल ये है कि क्या केवल धूम्रपान छोड़ देने से ही फेफड़ों को हेल्दी रखा जा सकता है?



स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, फेफड़ों की बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इसमें कई प्रकार के पर्यावरणीय कारकों और लाइफस्टाइल की गड़बड़ी को प्रमुख कारण माना जाता रहा है।  

बढ़ता वायु प्रदूषण, ई-सिगरेट, घर के अंदर का धुआं, लंबे समय तक धूल और रसायनों के संपर्क में रहना भी आपके फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है। इतना ही नहीं अगर आप धूम्रपान नहीं करते हैं लेकिन दूसरों के धूम्रपान के धुएं के संपर्क में भी रहते हैं तो इसका भी फेफड़ों की सेहत पर नकारात्मक असर हो सकता है।

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पैसिव स्मोकिंग के खतरे - फोटो : Adobe Stock

खुद नहीं पीते सिगरेट फिर भी खतरा

यदि आप धूम्रपान नहीं करते लेकिन ऐसे लोगों के संपर्क में रहते हैं जो सिगरेट पीते हैं तो इससे भी फेफड़ों की बीमारियों का खतरा हो सकता है।
 

  • यदि आपके आसपास कोई सिगरेट या बीड़ी पीता है, तो उसका धुआं आपके फेफड़ों तक भी पहुंचता है। इसे पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है। 
  • इससे फेफड़ों में जलन, एलर्जी, अस्थमा और लंबे समय में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। 
  • छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह और भी अधिक नुकसानदायक माना जाता है।
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प्रदूषण का फेफड़ों पर असर - फोटो : Adobe Stock

वायु प्रदूषण से होने वाला खतरा

अध्ययनों से पता चलता है कि केवल धूम्रपान ही नहीं, बढ़ता प्रदूषण भी फेफड़ों के लिए ठीक नहीं है। हवा में मौजूद पीए2.5, धूल, धुआं और जहरीली गैसें सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों में सूजन, सांस लेने में दिक्कत, अस्थमा और क्रॉनिक लंग डिजीज का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों पर इसका असर और अधिक होता है। 



रसायनों के संपर्क में तो नहीं रहते हैं आप?

निर्माण कार्य, फैक्ट्री, खदान, सीमेंट, कपड़ा उद्योग या कृषि जैसे कई पेशों में काम करने वाले लोग रोजाना धूल और रसायनों के संपर्क में आते हैं। यदि उचित सुरक्षा उपकरण नहीं पहने जाएं, तो ये कण धीरे-धीरे फेफड़ों में जमा होकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। ऐसे कार्यस्थलों पर हमेशा प्रमाणित सुरक्षा मास्क और अन्य सुरक्षा उपाय अपनाने चाहिए।

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बार-बार होने वाला श्वसन संक्रमण - फोटो : Freepik.com

इन खतरों को भी जानिए
 

  • नियमित व्यायाम केवल दिल ही नहीं, बल्कि फेफड़ों के लिए भी फायदेमंद है। लंबे समय तक बैठे रहने की आदत और निष्क्रिय जीवनशैली सांस फूलने और फेफड़ों की क्षमता कम होने का कारण बन सकती है।
  • बार-बार सर्दी, खांसी, ब्रोंकाइटिस या निमोनिया जैसे संक्रमण फेफड़ों पर असर डाल सकते हैं। यदि खांसी तीन सप्ताह से अधिक बनी रहे, खून आए, सांस लेने में तकलीफ हो तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। 




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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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