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World Brain Tumor Day: क्या मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने से ब्रेन ट्यूमर होता है? जान लीजिए इस सवाल का जवाब

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Mon, 08 Jun 2026 05:07 PM IST
सार

क्या मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन ब्रेन ट्यूमर का कारण बन सकती है? हम दिनभर फोन कान से लगाए रखते हैं, वीडियो देखते हैं, कॉल करते हैं और इंटरनेट चलाते हैं। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है। आइए इस बारे में जान लेते हैं।

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ब्रेन ट्यूमर का खतरा - फोटो : Amarujala.com/AI

ब्रेन में ट्यूमर होने की स्थिति गंभीर समस्याओं का कारण बन सकती है, हर साल इस बीमारी के कारण लाखों लोगों की मौत भी हो जाती है।



ट्यूमर का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में कैंसर का ख्याल आता है। जब बात ब्रेन में ट्यूमर की हो तो चिंता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि ब्रेन ही हमारे पूरे शरीर को कंट्रोल करता है। अगर इसमें कोई दिक्कत आ जाए तो इसका संपूर्ण स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर हो सकता है। 

ब्रेन ट्यूमर के लिए गड़बड़ जीवनशैली और बढ़ते पर्यावरणीय कारकों को प्रमुख माना जाता है। इससे संबंधित एक सवाल अक्सर लोगों के मन में बना रहता है कि क्या मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल करने से भी ट्यूमर होता है? क्या मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन ब्रेन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने वाली  हो सकती है? आइए इस बारे में विस्तार से जान लेते हैं।

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ब्रेन ट्यूमर की समस्या - फोटो : Freepik.com

ब्रेन ट्यूमर का बढ़ता खतरा

ब्रेन ट्यूमर के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने, बीमारी का जल्द पता लगाने के तरीकों के बारे में शिक्षित करने और ब्रेन ट्यूमर के मरीजों को हौंसला देने के उद्देश्य से हर साल  8 जून को 'वर्ल्ड ब्रेन ट्यूमर डे मनाया जाता है।

हम बात करने के लिए अक्सर फोन को कान से लगाए रखते हैं, ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं ये ट्यूमर का खतरा तो नहीं बढ़ाती है? ये सवाल लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इसे समझने के लिए किए गए अध्ययनों में पाया गया है कि मोबाइल फोन से ब्रेन ट्यूमर होने की बात सिर्फ अफवाह है, इसमें कोई सच्चाई नहीं है।

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मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल - फोटो : Freepik

क्या फोन के इस्तेमाल से होता है ब्रेन ट्यूमर?

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने स्पष्ट किया है कि मोबाइल फोन के इस्तेमाल से ब्रेन ट्यूमर या फिर कैंसर होने का कोई भी लिंक नहीं मिला है। 
 

  • इसके लिए 2.50 लाख से ज्यादा मोबाइल फोन यूजर्स का डेटा शामिल किया गया। 
  • इनमें से कई लोगों ने स्टडी में शामिल होने से पहले 15 साल या उससे ज्यादा समय तक नियमित मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया था। 
  • ऐसे लोगों में ब्रेन ट्यूमर (ग्लियोमा, मेनिंगियोमा के मामलों का पता लगाने के लिए औसतन 7 साल से ज्यादा समय तक नजर रखी गई।
  • जिन लोगों ने अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा घंटे मोबाइल फोन से बात की थी, उनमें ब्रेन ट्यूमर होने की दर उन प्रतिभागियों से अलग नहीं थी जिन्होंने मोबाइल का इस्तेमाल काफी कम किया था। 
  • इन नतीजों से पता चलता है कि मोबाइल फोन के इस्तेमाल से ट्यूमर के होने का खतरा नहीं बढ़ता है।
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मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ा रहा कैंसर का खतरा? - फोटो : Amarujala.com

क्या मोबाइल फोन से कैंसर होता है?

एक अन्य रिपोर्ट में कैंसर रिसर्च यूके के वैज्ञानिकों ने बताया कि मोबाइल फोन हो या फिर वाई-फाई, किसी से भी कैंसर नहीं होता है। वे जिस तरह का रेडिएशन का इस्तेमाल करते हैं, उनसे डीएनए को नुकसान पहुंचने का जोखिम न के बराबर होता है।
 

  • मोबाइल फोन और फोन टावर के रेडिएशन में डीएनए को नुकसान पहुंचाकर कैंसर पैदा करने के लिए एनर्जी नहीं होती है।
  • वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि मोबाइल फोन और ब्रेन ट्यूमर के बीच सीधा एवं निश्चित संबंध स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन शोध अभी भी जारी हैं।
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ब्रेन ट्यूमर का बढ़ता खतरा - फोटो : Freepik.com

कौन सी चीजें बढ़ा रही हैं खतरा?

शोध में अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन सी आदते सीधे तौर पर ब्रेन ट्यूमर का कारण बनती है। फिर भी कुछ जीवनशैली कारकों को खतरा बढ़ाने वाला माना जाता रहा है।
 

  • धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिकीय क्षति बढ़ाता है। अत्यधिक शराब सेवन भी कई कैंसरों का जोखिम बढ़ाता है।
  • मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता शरीर में सूजन बढ़ा सकती हैं। कुछ अध्ययनों में मोटापे और कुछ प्रकार के मस्तिष्क ट्यूमर के बीच संभावित लिंक देखे गए हैं। 
  • खराब नींद, अत्यधिक तनाव और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण तो नहीं माना जाता, लेकिन ये मस्तिष्क स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।
  • विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और धूम्रपान से दूरी बनाए रखना समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। 



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स्रोत: 
Mobile phone use and brain tumour risk – COSMOS, a prospective cohort study


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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