अगर मौजूदा समय में सबसे बड़ी स्वास्थ्य चिंताओं की बात की जाए तो कैंसर के बढ़ते मामले उनमें से एक हैं। पिछले एक-दो दशकों में ये बीमारी लोगों में काफी आम हो गई है। महिला-पुरुष, युवा-बुजुर्ग यहां तक कि 10 साल से कम उम्र के बच्चों में भी कैंसर के मामले देखे जा रहे हैं। जिस गति से ये बीमारी लोगों को अपनी चपेट में ले रही है इसको लेकर दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ काफी चिंतित है।
Cancer Risk: क्या मोबाइल, Wi-Fi और 5G से कैंसर होता है? सच जानना है तो पढ़ें ये रिपोर्ट
Mobile Ke Istemal Se Cancer Hota Hai: साल 2022 में अनुमानित 2 करोड़ कैंसर के नए मामले सामने आए और दुनिया भर में इस बीमारी से 97 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई। आखिर क्यों बढ़ती जा रही है ये जानलेवा बीमारी? कहीं ज्यादा मोबाइल, वाई-फाई या 5g जैसे सुविधाएं तो इसका कारण नहीं हैं?
कैंसर के बढ़ते मामले चिंताजनक
कैंसर के जोखिमों को लेकर दुनियाभर के विशेषज्ञ मुख्यरूप से शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, खानपान में मिलावट, पर्यावरण प्रदूषण और शराब-धूम्रपान जैसी आदतों को जिम्मेदार मानते हैं। तंबाकू-शराब पीना, फास्ट फूड, ज्यादा तला-भुना और प्रोसेस्ड भोजन भी शरीर में कैंसरकारी तत्वों को बढ़ाता है।
हालांकि पिछले एक दशक में जिस गति से वाई-फाई और 5G जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं इसने भी लोगों के मन में कैंसर को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों की आम धारणा है कि इनसे निकलने वाले रेडिएशन कैंसर का कारण हो सकते हैं।
हालांकि कैंसर होने के कारणों को लेकर किए गए अध्ययनों में वैज्ञानिक इन तथ्यों को सिरे से खारिज करते हैं।
मोबाइल के इस्तेमाल से कैंसर का खतरा?
हम अक्सर अपने फोन को कान से लगाकर रखते हैं या उन्हें जेब में रखते हैं। कुछ लोगों को चिंता है कि मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडिएशन कैंसर, खासकर ब्रेन कैंसर का कारण बन सकता है या फिर सीने के आसपास मोबाइल होने से ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है।
कैंसर रिसर्च यूके की रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बताया कि मोबाइल फोन और वाई-फाई से कैंसर नहीं होता है। वे जिस तरह का रेडिएशन का इस्तेमाल करते हैं, उनसे डीएनए को नुकसान पहुंचने का जोखिम न के बराबर होता है।
मोबाइल फोन और फोन टावर के रेडिएशन में डीएनए को नुकसान पहुंचाकर कैंसर पैदा करने के लिए एनर्जी नहीं होती है।
वाई-फाई या ब्लूटूथ से भी नहीं होता है कैंसर
विशेषज्ञ कहते हैं, मोबाइल एक तरह के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन का इस्तेमाल करते हैं जिसे रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन (रेडियो तरंगें) कहते हैं। यह एक कमजोर तरह का रेडिएशन है, उसी तरह का जैसा रेडियो, टेलीविजन और माइक्रोवेव ओवन से निकलता है।
- ये रेडियो तरंगें डीएनए को नुकसान पहुंचाने भर की शक्तिशाली नहीं होती हैं। इसलिए, इस बात का कोई सही कारण नहीं है कि रेडियो तरंगें कैंसर पैदा कर सकती हैं।
- इसी तरह से वाई-फाई या ब्लूटूथ के इस्तेमाल से भी कैंसर नहीं होता। वायरलेस टेक्नोलॉजी और सर्विस भी रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करती हैं।
साल 2011 में, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने कहा था कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड इंसानों के लिए कैंसर का कारण बन सकते हैं। हालांकि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड और कैंसर से जुड़े अध्ययनों में कई विरोधाभास है।
- उदाहरण के लिए, 2017 की एक रिसर्च रिव्यू के अनुसार, वायरलेस डिवाइस से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड ग्लियोमा का खतरा बढ़ा सकते हैं, जो एक तरह का ब्रेन ट्यूमर है।
- हालांकि 2018 की एक स्टडी में कहा गया है कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड और ब्रेन ट्यूमर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।
5G से खतरा है या नहीं?
साल 1996 में, डब्ल्यूएचओ ने इंटरनेशनल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड प्रोजेक्ट किया। ये प्रोजेक्ट इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड के कारण होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों पर काम कर रहा है।
डब्ल्यूएचओ, कैंसर रिसर्च यूके और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) जैसे हेल्थ अथॉरिटी के अध्ययनों में बताया गया है कि 5G से भी कैंसर नहीं होता है। 5G नॉन-आयोनाइजिंग रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करता है, जिनमें डीएन को सीधे नुकसान पहुंचाने की एनर्जी नहीं होती है।
5G, 4G, या मोबाइल फोन के इस्तेमाल को कैंसर से जोड़ने वाला कोई भरोसेमंद सबूत नहीं है। वैसे तो 5G पिछली जेनरेशन की तुलना में ज्यादा फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल जरूर करता है, लेकिन एनर्जी लेवल बहुत कम हैं और सेफ्टी लिमिट से नीचे होते हैं।
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स्रोत:
Do mobile phones or Wi-Fi cause cancer?
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