'कामसूत्र' के रचयिता वात्स्यायन से कई सौ साल पहले यूनानी साहित्य में काम की अवधारणा पर व्यापक चर्चा हुई थी। प्लेटो का मानना था कि 'काम किसी पर अधिकार जमाने की आकांक्षा है'। 'सिम्पोजियम' में यूनानी नाटककार अरिस्टोफैंस ने भी एक ऐसे समय का जिक्र किया था जब मानव अपने आप में परिपूर्ण हुआ करता था और उसे किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ती थी।
प्राचीन भारत में सेक्स को लेकर खुले विचार रखते थे लोग, कामसूत्र में कही गई हैं ये बातें
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बकौल प्लेटो हमारी अपूर्णता ने हमें दूसरे भाग की चाहत के लिए मजबूर किया। प्लेटो सेक्स की पूर्णता की मांग के तौर पर व्याख्या करते हैं। हम हर उस चीज से प्यार करते हैं जो हमारी अपनी नहीं है। लेकिन फिर एक ऐसा समय भी आया जब सेक्स के बारे में कहा जाने लगा कि ये बेकार की चीज है। सेक्स गंदा है और इसे करना पाप है।
325 ईस्वी में कैथलिक चर्च ने जब अपने कायदे कानून बनाए तो उसमें साफ कहा गया कि 'शरीर एक खराब चीज है। शारीरिक सुख फिजूल है और इसको पाने की इच्छा रखना पाप है।' उनका मानना था कि सेक्स का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ संतान को जन्म देना है। लेकिन लगभग उसी समय वात्स्यायन गंगा के तट पर बैठ कर कामसूत्र लिख रहे थे और बता रहे थे कि वास्तव में यौनिक आनंद बहुत अच्छी चीज है और इसे किस तरह और बढ़ाया जा सकता है।
सेक्स में खुलापन
प्राचीन भारतीय वास्तुकला में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो बताते हैं कि प्राचीन समय में सेक्स के बारे में लोगों की सोच कितनी खुली हुई थी। ओडीशा के कोणार्क के सूर्य मंदिर को ही लें जहाँ तराशी हुई नग्न मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। इसी तरह बौद्ध धर्म से जुड़ी अजंता और एलोरा की गुफाओं में भी युवतियों की नग्न मूर्तियां दिखाई देती हैं। अजंता के गुफा चित्र ईसा से दो सदी पहले बनाए गए थे। वहीं एलोरा की कलाकृतियां पांचवीं से दसवीं सदी के बीच की बताई जाती हैं।
भारत में सेक्स का खुला चित्रण मध्य प्रदेश के खजुराहो के मंदिरों में भी देखने को मिलता है। ये मंदिर करीब एक हजार साल पुराने हैं। इन्हें चंदेल राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी के बीच बनवाया था। उस दौरान कुल 85 मंदिर बनाए गए थे। लेकिन आज इनमें से सिर्फ 22 ही बचे हैं। यूनेस्को ने इन्हें 1986 में विश्व की धरोहर घोषित किया था। इन मंदिरों में यौन संबंधों का हर रूप देखने को मिलता है। दीवारों पर हर सेक्स आसन को चित्रित किया गया है। यहां पर तीन लोग एक साथ यौन संबंध बनाते हुए देखे जा सकते हैं।
एक अनोखी बात यह है कि भारत में जहां समलैंगिकता अभी तक कानूनन अपराध था उसी देश के प्राचीन मंदिर में समलैंगिकता को मूर्तियों के द्वारा समझाया गया है। 13 वीं सदी में माउंट आबू के पास बनवाए गए दिलवाड़ा मंदिरों में भी अंतरंग दृश्यों को संगमरमर में उकेरा गया है।
समलैंगिकता की स्वीकार्यता
वैसे समलैंगिकता दुनिया के दूसरे देशों में अपनी पहचान के लिए लड़ती रही लेकिन प्राचीन भारत में इसे सामाजिक मान्यता प्रदान की गई। अमर दास विल्हेम की किताब 'तृतिया- प्रकृति : पीपुल ऑफ द थर्ड सेक्स: अंडरस्टैंडिंग होमोसेक्शुएलिटी, ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी थ्रू हिंदुइज्म' में मध्यकालीन और संस्कृत ग्रंथों के शोध के बाद साबित किया गया है कि समलैंगिकता और 'तीसरा लिंग' भारतीय समाज में हमेशा मौजूद था।