छोटी सी बच्ची की नोटबुक के एक पन्ने पर पेंसिल से बनी एक ड्रॉइंग है, जिसमें दो लड़कियां रो रही हैं और एक-दूसरे का हाथ थामे हुई हैं। कमाठीपुरा के स्थानीय नगरपालिका स्कूल की तीसरी क्लास में पढ़ने वालीं सायमा अब इन लड़कियों के गाल पर आंसू के तीन बूंद बना रही हैं और उन बूंदों को थोड़ा गहरा कर रही हैं।
सेक्स वर्कर और उनके बच्चों के लिए परिवार जैसा कुछ होता है?
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एक दूसरी छोटी बच्ची भी अपनी नोटबुक खोलती है। उसमें दिल की ड्रॉइंग बनी हुई है, एक लाइन से वो इसे दो हिस्सों में बांट रही है। इन बच्चों ने अपनी नोटबुक में जो बनाया है, उसमें कोई घर नहीं है और न ही घर के बाहर कोई चारदीवारी है। उस शाम 50 के करीब बच्चे रात में चलने वाले शेल्टर में लौटकर आए हैं। यह शेल्टर मुंबई के बदनाम इलाके कमाठीपुरा में ग़ैर सरकारी संगठन प्रेरणा की ओर से चलाए जा रहे हैं। इस शेल्टर में सेक्स वर्करों के बच्चों को रात भर रखने की व्यवस्था है।
शेल्टर के कमरे पूरी तरह से सुसज्जित हैं। दीवारों पर क्रिसमस की सजावट दिख रही है। एक ब्लैक बोर्ड है और एक छोटा सा समुद्र तट भी बना हुआ है। दूसरी तरफ चटाई और बेडशीट्स रखी हुई हैं। एक छोटा सा टॉयलेट है। एक किचन भी है जहां इन बच्चों के लिए खाना बनाया जाता है। फिलहाल के लिए यह इन बच्चों का घर है।
वो अपने साथ स्कूल बैग और रात में बदलने के लिए कपड़े लेकर आए हैं लेकिन उनका बाकी सामान कहीं और है। उस गंदे से कमरे में, जहां उनकी मां रहती हैं। वे अपने इस घर में आते तो हैं लेकिन यहां बहुत देर नहीं रह पाते। जींस और धारीदार कमीज पहनी एक युवा मां गली के बाहर खड़ी हैं। उन्होंने लाल रंग की लिपस्टिक लगाई हुई है और खूब सारा मेकअप किया हुआ है।
करीब तीन साल का उनका बच्चा सेंटर में आते हुए रो रहा है। हालांकि वह पीछे मुड़कर अपनी मां को नहीं देखता, जिन्हें अपने काम पर लौटना है। पैसे के बदले पुरुषों के साथ सेक्स करने के काम पर।
कमाठीपुरा की गली नंबर नौ में बने सेंटर की सुपरवाइजर मुग्धा बताती हैं, "नया बच्चा है। उसे मालूम है कि उसे यहां आना है लेकिन रो रहा है। धीरे-धीरे अडजस्ट कर लेगा। सब बच्चे कर लेते हैं। इन परिवारों के पास कोई विकल्प नहीं होता।" देश के सबसे पुराने रेड लाइट इलाके के तौर पर पहचाने जाने वाले कमाठीपुरा में इन लोगों की ज्यादा कमाई भी नहीं होती लेकिन इलाके की पुनर्विकास योजनाओं के चलते किराया बढ़ गया है। अब बहुत ज्यादा कोठे भी नहीं रहे।
ऐसे में सेक्स वर्कर महिलाओं को मुश्किल हालात में रहना पड़ता है। छोटे कमरों में उन्हें किराए पर बेड लेना होता है। ऐसे कमरों में छह-छह बेड लगे होते हैं। नीचे वे खाना बनाते हैं और बेड के नीचे अपना सामान रखते हैं। यही वजह है कि बच्चों की ड्रॉइंग में घर की तस्वीर नहीं है। इन बच्चों का घर नहीं है। इन बच्चों की मांएं सेक्स वर्कर के तौर पर काम करती हैं लेकिन अपने बच्चों को स्कूल भेजती हैं ताकि उनके बच्चे इस दलदल से बाहर निकल सकें।
इन परिवारों में मांएं हैं, उनके बच्चे हैं और बहुत हुआ तो वे एनजीओ वाले, जो इन बच्चों की देखरेख करते हैं। पिता का जिक्र नहीं होता है। सेक्स वर्कर हमेशा अपने दम पर जीने पर जोर देती हैं क्योंकि उनके हिसाब से सभी पुरुष दुर्व्यवहार, विश्वासघात और शोषण करते हैं। आईवीएफ से बच्चे पैदा करने वाली, गोद लेने वाली और तलाक या अलगाव के बाद अकेली रहने वाली मांएं भी सिंगल मदर होती हैं लेकिन इनकी तुलना में सेक्स वर्करों की काफी मुश्किल चुनौतियों से दो-चार होना होता है।