मध्यप्रदेश के मंदसौर नगर में शिवना नदी के तट पर स्थित विश्वप्रसिद्ध अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ मंदिर इन दिनों सावन मास में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस मंदिर की विशेषता यहां स्थित भगवान पशुपतिनाथ की आठ मुखों वाली दुर्लभ प्रतिमा है, जो अपने आप में पूरे विश्व में अद्वितीय मानी जाती है।
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शिवना नदी के गर्भ से प्रकट हुई थी अद्वितीय प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
शिवना नदी के गर्भ से प्रकट हुई थी मूर्ति
मान्यता है कि भगवान पशुपतिनाथ की यह दुर्लभ अष्टमुखी प्रतिमा शिवना नदी के गर्भ से प्रकट हुई थी। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, एक धोबी ‘उदा’ जिस पत्थर पर कपड़े धोता था, वही पत्थर असल में भगवान शंकर की मूर्ति थी। एक दिन उसे स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन देकर बताया कि वह पत्थर मेरा अष्टमुखी रूप है। अगले दिन जब गांववालों ने मिलकर उसे नदी से बाहर निकाला, तो विशाल मूर्ति को निकालने में 32 बैलों की मदद लेनी पड़ी, लेकिन प्रतिमा नदी से दूर जाना ही नहीं चाहती थी। अंततः जिस स्थान पर आज मंदिर स्थित है, वहीं मूर्ति स्वतः स्थिर हो गई।
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भगवान पशुपतिनाथ की रहस्यमयी मूर्ति
- फोटो : अमर उजाला
18 वर्षों तक बगीचे में रही प्रतिमा
प्रतिमा को बाहर निकालने के बाद लगभग 18 वर्षों तक उसकी स्थापना नहीं हो सकी। इस दौरान जनसंघ के वरिष्ठ नेता शिवदर्शन अग्रवाल ने इसे अपने बगीचे में सुरक्षित रखा। बाद में भागवताचार्य श्री 1008 स्वामी प्रत्यक्षानंद जी ने मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की और राजमाता विजयाराजे सिंधिया के सहयोग से एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया। मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश भी स्थापित किया गया।
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सुरक्षा के पुख्ता के इंतजाम किए गए हैं
- फोटो : अमर उजाला
सावन में चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था
सावन मास के दौरान भक्तों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और पुलिस द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर में करीब 200 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं और 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी रखी जा रही है। सावन और भादौ में जब मंदसौर में मूसलाधार बारिश होती है, तब शिवना नदी उफान पर आ जाती है। इस दौरान नदी का जलस्तर बढ़कर मंदिर तक पहुंचता है और भगवान पशुपतिनाथ की मूर्ति जलमग्न हो जाती है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह शिवना नदी द्वारा हर वर्ष भगवान के चरण पखारने की परंपरा है।
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