रायसेन जिले के भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर 11वीं से 13वीं सदी की मंदिर वास्तुकला का एक अद्वितीय उदाहरण है। यहां सावन की हर सोमवारी को सुबह से ही भक्तों की कतारें लगी रहतीं हैं। देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और शिव भक्ति में लीन हो जाते हैं। यह मंदिर एक ऐतिहासिक और धार्मिक प्राचीन धरोहर है। इसलिए प्रशासन के द्वारा यहां व्यवस्थाएं भी अच्छी की जाती है।
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भोजेश्वर महादेव मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
कहा जाता है कि अगर यह मंदिर पूर्ण रूप से निर्मित हो जाता, तो यह प्राचीन भारत का एक आश्चर्य होता। मंदिर का अधूरा लेकिन नक्काशीदार गुम्बद और पत्थर की संरचनाएं, जटिल नक्काशी से बने भव्य प्रवेश द्वार और उनके दोनों ओर उत्कृष्टता से गढ़ी गई मूर्तियां दर्शकों का स्वागत करती हैं। मंदिर की बालकनियों को विशाल कोष्ठकों और खंभों का सहारा दिया गया है। मंदिर की बाहरी दीवारें और ढांचा कभी निर्मित ही नहीं हो पाए। मंदिर को गुम्बद के स्तर तक उठाने के लिए जो मिट्टी का रैम्प बनाया गया था वह आज भी दिखाई देता है, जो प्राचीन निर्माण कला की बुद्धिमत्ता को दर्शाता है।
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भोजपुर का प्रसिद्ध भोजेश्वर महादेव मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
हालांकि जहां ये मंदिर मौजूद है, उस शहर का भी अपना इतिहास है। बलुआ पत्थर की रिज पर बसा 11वीं सदी का शहर भोजपुर, जो मध्य भारत की एक खास भौगोलिक विशेषता है। यह मध्यप्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। बेतवा नदी इस प्राचीन शहर के समीप बहती है, जो भोजपुर को पुरानी दुनिया के आकर्षण से जोड़ती है। यह शहर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से मात्र 28 किलोमीटर दूर स्थित है।
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मंदिर के भीतर लोग
- फोटो : अमर उजाला
यहां ग्यारहवीं शताब्दी में बड़ी ही कुशलता से निर्मित दो बांध हैं, जो बेतवा नदी का रुख मोड़ने और पानी को रोकने के लिए विशाल पत्थरों से बनाए गए थे, जिससे एक झील का निर्माण हुआ था। भोजपुर का नाम परमार वंश के महान शासक राजा भोज के नाम पर रखा गया था। उनके शासनकाल में बिना तराशे गए विशाल पत्थरों से निर्माण करने की परंपरा थी, जिसे 'विशाल चिनाई' कहा जाता है। इसी शैली में बना यह बांध देखने योग्य है, चाहे आप सामान्य पर्यटक हों या वास्तुकला में रुचि रखने वाले।
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मंदिर का मुख्य द्वार
- फोटो : अमर उजाला
भोजपुर और उसके आसपास के पर्यटक स्थल, खासकर भोजेश्वर मंदिर, को ‘पूर्व का सोमनाथ’ भी कहा जाता है। यह भारत की उन अद्भुत संरचनाओं में से एक है जिसे एक बार अवश्य देखा जाना चाहिए। इस प्राचीन नगर के विशाल बांधों के अवशेष किसी को भी हैरत में डाल देते हैं। ‘अधूरा’ होने का तथ्य ही इस स्थान को एक अनूठी विशेषता प्रदान करता है। यहां की चट्टानी खदानें रोमांचक अनुभव कराती हैं, जहां हाथ से तराशे गए पत्थर की मूर्तियां देखने को मिलती हैं, जो कभी किसी मंदिर या महल का हिस्सा बनने से रह गईं। देश के अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर आपको सिर्फ खंडहर मिलते हैं, लेकिन यहां एक ऐसा अधूरा शहर है जो वास्तव में कभी पूरा नहीं हुआ।
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