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'हां, मैंने आतंकियों को देखा, उनके सिर पर खून सवार था'

Thu, 21 Jan 2016 02:00 PM IST
Updated Thu, 21 Jan 2016 02:00 PM IST
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'हां, मैंने आतंकियों को देखा, उनके सिर पर खून सवार था'

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मुख्य शहर पेशावर से 40 किलोमीटर दूर उत्तर में है चारसद्दा स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय। यहां सब कुछ सामान्य दिनों की तरह चल रहा था। यहीं सुबह साढ़े दस बजे खान अब्दुल गफ्फार खां की याद में मुशायरे की तैयारी थी। पांच सुरक्षा चेक थे मगर सुरक्षा घेरा सिर्फ वीआईपी लोगों के लिए था। छात्रों के लिए कोई सुरक्षा नहीं थी।


'हां, मैंने आतंकियों को देखा, उनके सिर पर खून सवार था'

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अचानक 9 बजे के आसपास परिसर में अंधाधुंध गोलियों की आवाजें गूंजने लगीं। खबर फैल गई कि परिसर में कुछ गड़बड़ है। तभी अंदर 10 धमाकों की आवाज सुनी गई और आतंकी हमले की सनसनी फैल गई।

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विश्वविद्यालय में तीन हजार छात्र पढ़ते थे। हमलावर हमारे जैसे थे। वे युवा थे। उनके पास एके-47 थी। उन्होंने सैनिकों की तरह जैकेट पहनी हुई थी। होस्टल में अभी कक्षाएं नहीं लग रही हैं। होस्टल में 200 से 300 छात्र थे। सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच जमकर गोलीबारी हुई। कुछ देर बाद सेना के लोगों ने उनके कमरों को खटखटा कर कहा, हम सुरक्षित हैं।: एक प्रत्यक्षदर्शी छात्र

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'हां, मैंने आतंकियों को देखा, उनके सिर पर खून सवार था'

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मैंने आतंकियों की गोलीबारी देखी। हमारे कैमिस्टी के प्रोफेसर ने हमें आगे जाने से रोका। उन्होंने अंदर जाने को कहा। आतंकियों के हाथ में पिस्टल थी :जियोलॉजी के छात्र जहूर अहमद

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विश्वविद्यालय के द्वार पर ही आतंकी घात लगा कर बैठ गए। : कैमिस्टरी के छात्र
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