16 दिसंबर, 2014 की तारीख खूनी थी या फिर वो आतंकवादी जिन्होंने सैकड़ों मांओं की गोद को सूना कर दिया। उधर स्कूल में खून से सनी उन निर्दोष बच्चों की किताबें थी तो दूसरी तरफ उन सभी मां का दर्द था जो आसुंओं के सैलाब के जरिए बह रहा था। वो चीख रही थीं पर उनकी चीख में आवाज नहीं थी। बस एक ऐसा दर्द था जो शायद कभी भी खत्म न हो सके। जिन बच्चों के लिए उन सभी ने ख्वाब संजोए थे। अब वो सब ख्वाब टूट रहे थे। ख्वाबों को भी टूटते हुए दर्द हो रहा था कि काश हम पूरे हो जाते। उन मासूम बच्चों के लिए ही सही बस हम ख्वाबों को पूरा होना चाहिए था। आज फिर पूरा पाकिस्तान रो रहा है, उन मासूम बच्चों और निर्दोष लोगों की याद में जिन्हें आतंकियों ने मार डाला था।
यादें: दर्द मिला ऐसा जो मरते दम तक ना जा पाएगा
Updated Wed, 16 Dec 2015 04:24 PM IST
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यादें: दर्द मिला ऐसा जो मरते दम तक ना जा पाएगा
यादें: दर्द मिला ऐसा जो मरते दम तक ना जा पाएगा
यादें: दर्द मिला ऐसा जो मरते दम तक ना जा पाएगा
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