आधुनिक दौर में जहां शादियों में लग्जरी कारों और बड़ी बारातों का चलन बढ़ गया है, वहीं बांसवाड़ा जिले के बड़ोदिया कस्बे के पास बिलडी गांव में रविवार को अनोखी और परंपरागत अंदाज में बारात निकली। इसमें दूल्हा और उसके सगे संबंधी और अन्य बाराती ऊंटों पर सवार रहे। इस बारात ने लोगों का खासा ध्यान आकर्षित किया।
रेगिस्तान के जहाज पर निकली बारात: दूल्हे-बाराती सजे-धजे ऊंटों पर थे सवार, बांसवाड़ा में अनूठी शादी की तस्वीरें
Wedding Procession on Camels: बांसवाड़ा के बिलडी गांव में दूल्हा दीपक ऊंटों पर सवार होकर बारात लेकर पहुंचे। इस बारात में सजे ऊंट खासा आकर्षण बने। इस 8 किमी यात्रा में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। परिवार ने इसे परंपरा को बढ़ावा और कम खर्च वाला तरीका बताया है।
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बिलडी निवासी दीपक पुत्र पुनिया मुनिया अपनी दुल्हन कल्पना गरासिया पुत्री अशोक गरासिया को ब्याहने के लिए ऊंटों की सवारी पर बारात लेकर निकले तो इसे देखने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। गांव में पहली बार इतने बड़े स्तर पर ऊंटों की सवारी के साथ बारात निकाली गई। यह बिलडी गांव से रवाना होकर 8 किलोमीटर की दूरी तय कर गरासिया बिलडी गांव पहुंची। ग्रामीण इस बारात को देखने के लिए सड़कों के किनारे खड़े रहे।
सजे ऊंट बने आकर्षण का केंद्र
बारात में शामिल सभी ऊंटों को रंग-बिरंगे कपड़ों, घंटियों और आकर्षक सजावट से सजाया गया था। ऊंटों की सजी-धजी सवारी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रही। दूल्हा और उसके परिजन भी कुछ ऊंटों पर सवार होकर बारात में शामिल हुए, जबकि कई बाराती ऊंटों के साथ चलते हुए नाचते-गाते शादी स्थल तक पहुंचे। दूल्हा और कुछ परिजन ऊंट पर ही विवाह स्थल के बाहर तक पहुंचे। जिससे माहौल में उत्साह और उल्लास का अनोखा रंग देखने को मिला। इस अनूठे नजारे को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंच गए।
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परंपरा को बढ़ावा देने की पहल
दूल्हे के पिता पुनिया मुनिया ने बताया कि इससे पहले गत वर्ष भी उनके भतीजे की शादी में ऊंटों की सवारी से बारात निकाली गई थी। इस बार अपने पुत्र दीपक की शादी में भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। यदि समाज में इस प्रकार की परंपरा को बढ़ावा मिलेगा तो रेगिस्तान के इस महत्वपूर्ण पशु के पालन-पोषण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
वाहनों की भीड़ से बेहतर परंपरागत तरीका
पुनिया ने कहा कि आजकल एक बारात में दर्जनों कार, बोलेरो, बस और अन्य वाहनों का उपयोग होता है, जिससे खर्च भी अधिक होता है और भीड़भाड़ भी बढ़ती है। लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। वहीं ऊंटों की सवारी से कम खर्च में पारंपरिक और यादगार आयोजन किया जा सकता है।