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पानी के लिए पलायन: जयपुर से महज 80 किमी दूर प्यास से जूझता सांभर झील कस्बा, त्रासदी की क्या है सच्चाई; जानें

Mon, 02 Jun 2025 03:41 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: शबाहत हुसैन Updated Mon, 02 Jun 2025 03:41 PM IST
सार

Rajasthan: इन दिनों सांभर कस्बे के निवासी पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं।  हालत ये हैं कि इन तंग गलियों में पानी के टैंकर भी नहीं पहुंच पाते। टैंकर बुलवाना भी आमजन के लिए आर्थिक बोझ बन गया है। मजबूरी में लोग दोगुनी कीमत चुका रहे हैं। आइये पूरी खबर में जानते हैं।

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Jaipur News Sambhar Lake Water Crisis Migration Due to Water Shortage in Rajasthan Know Details in Hind
सांभर झील में पानी की किल्लत - फोटो : अमर उजाला
राजस्थान की राजधानी जयपुर से केवल 80 किलोमीटर दूर स्थित सांभर झील कस्बा इन दिनों भीषण जल संकट से त्रस्त है। देश की सबसे बड़ी खारे पानी की झील के किनारे बसे इस कस्बे में पानी का ऐसा अकाल पड़ा है कि लोग अपने पुश्तैनी मकान छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। मोहल्लों की दीवारों पर चस्पा “मकान बिकाऊ है” के पोस्टर इस त्रासदी की गवाही दे रहे हैं।
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गलियों में पलायन के लगे पोस्टर - फोटो : अमर उजाला
हर नल से मायूसी, हर गली में पलायन का दर्द
सांभर कस्बे के वार्ड 22 और 23 के लगभग दस मोहल्ले  चारभुजा मंदिर गली, चौधरियों की गली, जोशियों की गली, कालानियों की गली, दादूद्वारा, लक्ष्मीनाथ मंदिर गली, लाहोटियों की गली, मंडी, झंडे की गली और शेषनारायण गली बुनियादी जल सुविधाओं से कोसों दूर हैं। हालत ये हैं कि इन तंग गलियों में पानी के टैंकर भी नहीं पहुंच पाते। टैंकर बुलवाना भी आमजन के लिए आर्थिक बोझ बन गया है। मजबूरी में लोग दोगुनी कीमत चुका रहे हैं।
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बाल्टी में पानी लेकर जाता बच्चा - फोटो : अमर उजाला
तीन दिन में चार घड़े पानी, बाकी समय इंतजार
स्थानीय निवासी बताते हैं कि तीन दिन में मुश्किल से चार से छह घड़े पानी मिल पाता है। कई बार आधा किलोमीटर दूर से पानी ढोना पड़ता है। व्यवसायी पराग पोद्दार अपनी 250 साल पुरानी हवेली छोड़ने की तैयारी में हैं। ललित सोनी, जो चार साल पहले लाखों खर्च कर नया घर बनवाए थे, अब उस घर को बेचने को मजबूर हैं। गृहणी संतोष सैन बताती हैं कि घर में एक भी नल काम नहीं करता, सारा पानी टैंकर से आता है। इस कारण घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। स्थानीय निवासी जगदीश बोहरा कहते हैं कि पानी आने का कोई तय समय नहीं है। कभी सुबह, कभी दोपहर, कभी हफ्तों बाद। इससे बच्चों की पढ़ाई और बड़ों का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

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वादे अधूरे, योजनाएं ठप
चारभुजा मोहल्ला, जोशियों की गली जैसे इलाकों में वर्षों पहले टंकी निर्माण की स्वीकृति मिल चुकी थी, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ। स्थानीय निवासी विजय व्यास का कहना है कि प्रशासन और पीएचईडी विभाग की लापरवाही से आज हालात यहां तक पहुंच गए हैं। कुछ वार्डों में पर्याप्त जलापूर्ति है, लेकिन इन दो-तीन वार्डों में हालत बद से बदतर है। नलों से पानी भले ही ना आए, लेकिन जलदाय विभाग हर महीने बिल जरूर भेजता है। लोगों का कहना है कि जब सप्लाई आती भी है तो दबाव इतना कम होता है कि चार घड़े भी नहीं भरते।
 
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घरों में पलायन के लगे पोस्टर - फोटो : अमर उजाला
राजनीति में फंसा जीवन
फुलेरा विधायक विद्याधर चौधरी (कांग्रेस) ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार इस क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। वहीं पूर्व विधायक निर्मल कुमावत (भाजपा) ने बताया कि अमृत योजना के तहत टंकी निर्माण का टेंडर हो चुका है, लेकिन तकनीकी बाधाएं आ रही हैं। इधर, पीएचईडी के सहायक अभियंता संजय का कहना है कि नई पाइपलाइन बिछाई जा रही है, लेकिन पानी ऊंचाई पर बसे मोहल्लों तक नहीं पहुंच पा रहा। एसडीएम अंजू वर्मा ने कहा कि गर्मियों में जल संकट गहरा जाता है। पहले टंकी के लिए निकला टेंडर रद्द हो गया था, लेकिन अब नया टेंडर जारी किया जाएगा।

सांभर की प्यास, एक चेतावनी
राजस्थान के रेगिस्तान में नहीं, राजधानी से लगे एक कस्बे में पानी की यह भयावह तस्वीर हमें चेतावनी देती है। ये सिर्फ एक कस्बे की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की गूंज है, जो हर गली में, हर सूखे नल में और हर बिकती हवेली में सुनाई देती है।
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