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Jaya Ekadashi 2021: जया एकादशी कब है, जानें तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि, महत्व और कथा

Thu, 18 Feb 2021 07:10 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Thu, 18 Feb 2021 07:10 AM IST
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Jaya Ekadashi 2021 date muhurat timing vrat vidhi significance and katha
जया एकादशी 2021 - फोटो : अमर उजाला

Jaya Ekadashi 2021 Date: जया एकादशी व्रत 23 फरवरी को रखा जाएगा। माघ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म में जया एकादशी तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डव पुत्र युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व बताया था, जिसके बाद उन्होंने जया एकादशी का व्रत किया था। आइए जानते हैं जया एकादशी व्रत का मुहूर्त, महत्व और व्रत कथा।

Jaya Ekadashi 2021 date muhurat timing vrat vidhi significance and katha
जया एकादशी 2021 - फोटो : अमर उजाला।
जया एकादशी मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारंभ : 22 फरवरी सायं 05:16 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त : 23 फरवरी सायं 06:05 बजे तक
जया एकादशी पारणा मुहूर्त : 24 फरवरी को सुबह 06:51 बजे से 09:09 बजे तक
अवधि : 2 घंटे 17 मिनट
Jaya Ekadashi 2021 date muhurat timing vrat vidhi significance and katha
जया एकादशी व्रत विधि - फोटो : अमर उजाला
जया एकादशी व्रत विधि 
  • प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें। 
  • व्रत का संकल्प लें और फिर विष्णु जी की आराधना करें।
  • भगवान विष्ण़ु को पीले फूल अर्पित करें। 
  • घी में हल्दी मिलाकर भगवान विष्ण़ु का दीपक करें। 
  • पीपल के पत्ते पर दूध और केसर से बनी मिठाई रखकर भगवान को चढ़ाएं। 
  • एकादशी की शाम तुलसी के पौधे के सामने दीपक जलाएं।
  • भगवान विष्णु को केले चढ़ाएं और गरीबों को भी केले बांट दें। 
  • भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी का पूजन करें और गोमती चक्र और पीली कौड़ी भी पूजा में रखें।
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जया एकादशी व्रत का महत्व - फोटो : सोशल मीडिया
जया एकादशी व्रत का महत्व

पौराणिक शास्त्रों में जया एकादशी को बहुत ही पुण्यदायी एकादशी माना गया है। यह एकादशी का व्रत करने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को भूत-प्रेत, पिशाच मुक्ति मिल जाती है। 

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जया एकादशी 2021 - फोटो : अमर उजाला।
जया एकादशी व्रत कथा
जया एकादशी के बारे में एक कथा का उल्लेख किया गया है कि इन्द्र की सभा में एक गंधर्व गीत गा रहा था। परन्तु उसका मन अपनी प्रिया को याद करने लगा। इस कारण से गाते समय उसकी लय बिगड़ गई। इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर गंधर्व और उसकी पत्नी को पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। पिशाच योनी में जन्म लेकर पति पत्नी कष्ट भोग रहे थे। संयोगवश माघ शुक्ल एकादशी के दिन दुःखों से व्याकुल होकर इन दोनों ने कुछ भी नहीं खाया और रात में ठंड की वजह से सो भी नहीं पाये। इस तरह अनजाने में इनसे जया एकादशी का व्रत हो गया। इस व्रत के प्रभाव से दोनों श्राप मुक्त हो गये और पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में लौटकर स्वर्ग पहुंच गये। देवराज इन्द्र ने जब गंधर्व को वापस इनके वास्तविक स्वरूप में देखा तो वे हैरान हुए। गन्धर्व और उनकी पत्नी ने बताया कि उनसे अनजाने में जया एकादशी का व्रत हो गया। इस व्रत के पुण्य से ही उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।
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