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Muharram 2019: जानिए कब और क्यों मनाया जाता है मुहर्रम

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत राय Updated Fri, 30 Aug 2019 04:49 PM IST
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Muharram 2019 know about the important facts of muharram

मुहर्रम का महीना इस साल 31 अगस्त से शुरू होगा और अशुरा यानी कि मुहर्रम का मुख्य दिन 10 मंगलवार को मनाया जाएगा। मुहर्रम पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। बता दें कि इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक मुहर्रम हिजरी संवत का प्रथम मास है। इस्लाम धर्म में मुहर्रम एक प्रमुख त्योहार है। इस पूरे दस दिन इमाम हुसैन का शोक मनाया जाता है। दरअसल, इसी महीने में पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब, मुस्तफा सल्लाहों अलैह और आलही वसल्लम ने पवित्र मक्का से पवित्र नगर मदीना में हिजरत किया था।

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- फोटो : Shivharsh Dwivedi

मुहर्रम में क्या करते हैं लोग
मुहर्रम में कई लोग रोजा रखते हैं। पैगंबर मुहम्मद साहब के नाती की शहादत और करबला के शहीदों के बलिदान को याद किया जाता है। करबला के शहीदों ने इस्लाम धर्म को नया जीवन दिया था। कई लोग इस पवित्र माह में पहले दस दिनों के रोजे रखते हैं। जो लोग दस दिन तक रोजा नहीं रख पाते वो 9 और 10 तारीख का रोजा रखते हैं। इस दिन पूरे देश में लोगों की अटूट आस्था का भरपूर समागम देखने को मिलता है। 

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- फोटो : amar ujala

इस खास दिन पर जगह-जगह प्याऊ और शरबत की शबील लगाई जाती है। कहा जाता है कि इसी दिन पैगंबर हजरत मोहम्मद के नाती हजरत इमाम हुसैन एक धर्मयुद्ध में शहीद हुए थे। कर्बला यानी कि आज के वक्त का इराक, जहां सन् 60 हिजरी को यजीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा। वह अपने वर्चस्व को पूरे अरब में फैलाना चाहता था, जिसके लिए उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पैगंबर मुहम्मद के खानदान के इकलौते चिराग इमाम हुसैन, जो झुकने को बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। इस कारण साल 61 हिजरी से यजीद के अत्याचार बढ़ने लगे। ऐसे में वहां के बादशाह इमाम हुसैन अपने परिवार के साथ मदीना से इराक के शहर कुफा जाने लगे। लेकिन रास्ते में यजीद की फैज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया।

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- फोटो : amar ujala

वह दो मुहर्रम का दिन था, जब हुसैन का काफिला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका। वहां पानी का एकमात्र जरिया था फराच नदी, जिस पर यजीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी के लिए रोक लगा दी थी। बावजूद इसके इमाम हुसैन झुके नहीं। और आखिर में युद्ध का एलान हो गया। कहा जाता है कि यजीद की 80 हजार फौज के आगे हुसैन के 72 बहादुरों ने जिस तरीके से लड़ाई लड़ी थी, उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक-दूसरे को देते थे। 

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- फोटो : self

हुसैन ने अपने नाना और पिता द्वारा सिखाए गए सदाचार से सब पर विजय प्राप्त कर ली। 10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और अंत में अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका। एक बार अस्र की नमाज के दौरान जब इमाम हुसैन सजदा कर रहे थे तब एक यजीदी को लगा कि यही सही मौका है हुसैन को मारने का तो उसने हुसैन को शहीद कर दिया। तभी से उसके उपलक्ष में मुहर्रम मनाया जाता है।  

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