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Nirjala Ekadashi 2026: 5 बड़े संयोग में निर्जला एकादशी, पढ़ें विष्णु जी की आरती, चालीसा और मंत्र

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: मेघा कुमारी Updated Thu, 25 Jun 2026 06:28 AM IST
सार

Nirjala Ekadashi 2026: आज 25 जून 2026 को देशभर में श्रद्धा और आस्था के साथ निर्जला एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। इस विशेष अवसर पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही भक्तजन दान-पुण्य, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान कर भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करते हैं।

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Nirjala Ekadashi 2026 shubh muhurat and vishnu ji aarti mantra chalisa
Nirjala Ekadashi 2026 - फोटो : अमर उजाला AI

Nirjala Ekadashi 2026: आज 25 जून 2026, गुरुवार को निर्जला एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। यह ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि होती है, जिसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा-पाठ, उपवास, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करने से विशेष शुभ फल की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है। मान्यता यह भी है कि, इस दिन केले के पेड़ की पूजा करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र विवाह के योग बनते हैं। खास बात यह है कि इस वर्ष निर्जला एकादशी पर रवि योग, शिव योग, सिद्ध योग और गुरुवार समेत कुल 5 बेहद शुभ संयोग बन रहे हैं, जिससे इस दिन किए गए पूजन का फल कई गुना बढ़ सकता है। ऐसे में भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पूजा के दौरान आरती, चालीसा और मंत्रों का जाप अवश्य करना चाहिए।

Nirjala Ekadashi 2026 shubh muhurat and vishnu ji aarti mantra chalisa
Nirjala Ekadashi 2026 - फोटो : adobe stock
विष्णु जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥

 
Nirjala Ekadashi 2026 shubh muhurat and vishnu ji aarti mantra chalisa
Nirjala Ekadashi 2026 - फोटो : freepik
भगवान विष्णु के सबसे प्रभावशाली मंत्र 
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" 
"ॐ नमो नारायणाय" 

भगवान विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात:
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Nirjala Ekadashi 2026 shubh muhurat and vishnu ji aarti mantra chalisa
Nirjala Ekadashi 2026 - फोटो : adobe

विष्णु चालीसा 
  दोहा 
विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय,
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।।

 

नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी।।

सुंदर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत।।

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे।।

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन।।

पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण।।

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा।।

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रत्नन को निकलाया।।

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया।।

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया।।

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया।।

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई।।

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी।।

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी।।

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे।।

हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे।।

चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन।।

शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण।।

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई।।

दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ।।

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै।।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  

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