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Sawan: सावन में क्यों रखा जाता है सोलह सोमवार का व्रत? एक पुजारी के श्राप से शुरू हुई कहानी, पढ़ें पूरी कथा

Thu, 06 Aug 2026 05:20 PM IST
दीक्षा पाठक धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: दीक्षा पाठक Updated Thu, 06 Aug 2026 05:20 PM IST
सार

Sawan Vrat Katha in Hindi: सोलह सोमवार व्रत की यह कथा भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है। कथा के अनुसार एक पुजारी को माता पार्वती के श्राप से कोढ़ हो गया, लेकिन श्रद्धा और विधिपूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करने से उसे रोग से मुक्ति मिल गई। इसके बाद यही व्रत कई लोगों के जीवन में सुख, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का कारण बना। 

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Solah Somvar Vrat Katha The Sacred Fast That Changed Every Destiny in Sawan Know Here
भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : AI

धार्मिक मान्यता के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण करते हुए मृत्युलोक पहुंचे। दोनों अमरावती नाम की सुंदर नगरी में बने भगवान शिव के भव्य मंदिर में ठहर गए। एक दिन माता पार्वती ने प्रसन्न मन से भगवान शिव को चौसर खेलने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उसी समय मंदिर का पुजारी पूजा करने पहुंचा। खेल शुरू होने से पहले माता पार्वती ने पुजारी से पूछा कि इस बाजी में जीत किसकी होगी। बिना विचार किए पुजारी ने महादेव की विजय की बात कह दी, लेकिन खेल समाप्त होने पर जीत माता पार्वती की हुई। पुजारी की गलत भविष्यवाणी से माता पार्वती क्रोधित हो गईं। भगवान शिव ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, फिर भी उन्होंने पुजारी को कोढ़ होने का श्राप दे दिया। देखते ही देखते पुजारी गंभीर रोग से पीड़ित हो गया और उसका जीवन दुखों से भर गया।

Solah Somvar Vrat Katha The Sacred Fast That Changed Every Destiny in Sawan Know Here
भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe

गलत भविष्यवाणी करने पर पूजारी को मिला श्राप
कई दिनों तक कष्ट झेलने के बाद एक दिन देवलोक की अप्सराएं भगवान शिव की पूजा करने मंदिर पहुंचीं। उन्होंने पुजारी की दयनीय स्थिति देखी और उसके दुख का कारण पूछा। पूरी बात जानने के बाद अप्सराओं ने उसे निराश न होने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सावन का महीना आरंभ हो चुका है और यदि वह पूरे श्रद्धा भाव से सोलह सोमवार का व्रत करेगा तो भगवान शिव की कृपा अवश्य प्राप्त होगी। अप्सराओं ने व्रत की पूरी विधि भी बताई। उन्होंने कहा कि सोमवार के दिन स्वच्छ वस्त्र धारण कर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करें। गेहूं के आटे के तीन भाग बनाकर एक भाग भगवान शिव को अर्पित करें और शेष प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटें। लगातार सोलह सोमवार तक यही नियम अपनाने के बाद सत्रहवें सोमवार को विशेष रूप से गेहूं, घी और गुड़ का चूरमा बनाकर भगवान शिव को अर्पित करें और सभी में बांटें।

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : अमर उजाला

अप्सराओं ने पूजारी को बताया समाधान
पुजारी ने अप्सराओं की बताई विधि के अनुसार पूरे विश्वास और श्रद्धा से सोलह सोमवार का व्रत किया। भगवान शिव की कृपा से उसका कोढ़ समाप्त हो गया और वह फिर से स्वस्थ जीवन जीने लगा। कुछ समय बाद जब भगवान शिव और माता पार्वती दोबारा उसी मंदिर में पहुंचे तो पुजारी को पूर्ण रूप से निरोग देखकर माता पार्वती भी आश्चर्यचकित रह गईं। पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत की महिमा सुनाई। इसके बाद माता पार्वती ने भी यह व्रत किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। उनके रूठे पुत्र स्वामी कार्तिकेय भी पुनः माता के प्रति स्नेह और आज्ञाकारिता से भर गए। यही कथा आगे कई लोगों के जीवन में इस व्रत की महिमा का कारण बनी।

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe

कार्तिकेय ने किया सोलह सोमवार का व्रत
कार्तिकेय ने जब अपनी माता से सोलह सोमवार व्रत का महत्व जाना, तो उन्होंने भी इसे पूरी श्रद्धा के साथ करने का संकल्प लिया। उनके मन में एक ही इच्छा थी वर्षों से बिछड़े अपने प्रिय ब्राह्मण मित्र से दोबारा मिलना। मान्यता के अनुसार भगवान शिव की कृपा से उनकी यह मनोकामना पूरी हुई और दोनों मित्रों का मिलन हो गया। जब ब्राह्मण ने इस संयोग का कारण पूछा, तब कार्तिकेय ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई। यह सुनकर ब्राह्मण ने भी अपने जीवन की सबसे बड़ी चिंता, विवाह, की कामना लेकर भगवान शिव का यह व्रत शुरू कर दिया।

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भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे प्रसिद्ध व्रत - फोटो : adobe

ब्राह्मण की चिंता भी हुई दूर
समय बीता और एक दिन वह ब्राह्मण ऐसे राज्य में पहुंचा, जहां राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित था। राजा ने पहले ही घोषणा कर रखी थी कि जिस युवक के गले में सुसज्जित हथिनी वरमाला डालेगी, वही उसकी पुत्री का जीवनसाथी बनेगा। सभा में दूर-दूर से आए राजकुमार अपनी किस्मत आजमा रहे थे, लेकिन भगवान शिव की इच्छा कुछ और ही थी। हथिनी ने सभी को छोड़कर सीधे उस ब्राह्मण के गले में माला डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा निभाई और पूरे सम्मान के साथ राजकुमारी का विवाह उसी ब्राह्मण से कर दिया। विवाह के बाद जब राजकुमारी ने इस सौभाग्य का रहस्य जाना तो उसने भी पुत्र प्राप्ति की कामना से सोलह सोमवार का व्रत किया। भगवान शिव की कृपा से उसके घर एक तेजस्वी, धर्मपरायण और गुणवान पुत्र का जन्म हुआ।

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