नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में, अलकनंदा नदी के बायीं तरफ बसे आदितीर्थ बद्रीनाथ धाम न सिर्फ श्रद्धा व आस्था का अटूट केंद्र है, बल्कि अपने अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य से भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह तीर्थ हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक है। यह पवित्र स्थल भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार नर एवं नारायण की तपोभूमि है।
चार धाम यात्रा 2019 : 10 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ के कपाट, जानें इसे क्यों कहते हैं 'धरती का वैकुण्ठ'
आदि शंकराचार्य की रही है कर्मस्थली
भगवान नारायण के वास के रूप में जाना जाने वाला बद्रीनाथ धाम आदि शंकराचार्य की कर्म स्थली रहा है।यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वीं सदी में मंदिर का निर्माण करवाया था।मंदिर के वर्तमान प्रारूप का निर्माण सोलहंवी सदी में गढ़वाल के राजा ने करवाया था । मंदिर के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते है जिन्हें रावल कहा जाता है। यह जब तक रावल के पद पर रहते है इन्हें ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना होता है।
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जब खुलते हैं बंद कपाट...
बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर (शालिग्राम) की प्रतिमा है, जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में सुशोभित है। यह मंदिर तीन भागों गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभा मंडप में बंटा हुआ है। मंदिर परिसर में अलग-अलग देवी-देवताओं की 15 मूर्तियां विराजमान हैं। अक्षय तृतीया पर जब बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, उस समय भी मंदिर में एक दीपक जलता रहता है, इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्त्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाज़े के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।
धरती का वैकुण्ठ
हिमालय की तलहटी में बसे बद्रीनाथ धाम को''धरती का वैकुण्ठ'' कहा जाता है।बद्रिकाश्रम यानि ''बदरी सदृशं तीर्थम् न भूतो न भविष्यति ''अर्थात बद्रीनाथ जैसा स्थान मृत्युलोक में न पहले कभी था न भविष्य में होगा।माना जाता है कि भगवान विष्णु विग्रह रूप में यहाँ तपस्यारत हैं। यहाँ के दिव्य दर्शन करने पर मेरा अनुभव है कि भगवान विष्णु के विग्रह को एकटक निहारने पर ऐसी अनुभूति होती है जैसे सामने साक्षात भगवान विष्णु हों।मन आनंद से भावविभोर हो उठता है।
जानें क्या चढ़ता है प्रसाद
यहां वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। वन तुलसी की महक से पूरा माहौल आनंदित हो जाता है। इस मंदिर का कई रंगों से बना प्रवेश द्वार दूर से ही पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिसे सिंह द्वार भी कहा जाता है। मंदिर के निकट बनी व्यास और गणेश की गुफाएं हैं, जो अति सुन्दर हैं। यहीं बैठकर वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी। माना जाता हैं कि पांडव, द्रोपदी के साथ इसी रास्ते होकर स्वर्ग गए थे।

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