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रामनवमी: भीलूड़ा धाम में आस्था का अनोखा संगम, नेत्रहीन शिल्पकार की मूर्ति में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांसवाड़ा Published by: बांसवाड़ा ब्यूरो Updated Thu, 26 Mar 2026 04:12 PM IST
सार

Ram Navami 2026: बांसवाड़ा-डूंगरपुर के भीलूड़ा धाम में स्थित रघुनाथ मंदिर में नेत्रहीन शिल्पकार द्वारा बनाई प्रतिमा में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन होते हैं। ऐतिहासिक, पौराणिक और भक्ति परंपराओं के कारण यह स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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Ram Navami Unique Confluence of Faith at Bhiluda Dham Witnessing Unity of Ram-Krishna in Blind Sculptor's Idol
नेत्रहीन शिल्पकार की मूर्ति में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन - फोटो : अमर उजाला

बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग 927-ए पर स्थित भीलूड़ा में भगवान रघुनाथ का मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। यह मंदिर ‘भीलूड़ा सरकार’ के नाम से भी जाना जाता है, जहां हर वर्ष रामनवमी पर बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं और मेले जैसा वातावरण बन जाता है। यह मंदिर करीब 464 वर्ष पुराना है और इसका निर्माण संवत 1619 में हुआ था।


 
डूंगरपुर के तत्कालीन शासक जसवंत सिंह एवं विजय सिंह के कार्यकाल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया गया। मन्दिर की संपूर्ण व्यवस्था वर्तमान में भी डूंगरपुर के पूर्व राजपरिवार के निर्देशन में की जाती है।
 

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Ram Navami Unique Confluence of Faith at Bhiluda Dham Witnessing Unity of Ram-Krishna in Blind Sculptor's Idol
नेत्रहीन शिल्पकार की मूर्ति में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन - फोटो : अमर उजाला

कमर और पैर कृष्ण की भांति
इस मंदिर से जुड़ी कुछ मान्यताएं भी हैं। कहा जाता है कि भगवान की त्रिभंगी श्याम वर्ण मूर्ति एक नेत्रहीन शिल्पकार द्वारा बनाई जा रही थी। वह श्रीराम का विराट रूप सहित बाएं लक्ष्मण और दाएं सीता माता का स्वरूप उकेरते समय कमर बांकी और चरण कृष्ण भगवान की तरह मुड़े हुए बन गए। उसके कान में अटकाया औजार अचानक सीधे मूर्ति के चरण के अंगूठे पर जा गिरा। मूर्ति खण्डित हो गई। मूर्तिकार दुःखी हुआ और रोया। भगवान ने उसे स्वप्न में कहा कि मूर्ति खंडित नहीं हुई है। मैंने उसे पूर्ण कर दिया है। कृष्णावतार के समय शिकारी ने मेरे अंगूठे पर बाण मारा था। अब मेरी यह मूर्ति श्रीराम और कृष्ण के एकरूपता का दर्शन करवाएगी। भक्तों में राम और कृष्ण में भेद बुद्धि के नाश के लिए ऐसी लीला की गई है।
 

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Ram Navami Unique Confluence of Faith at Bhiluda Dham Witnessing Unity of Ram-Krishna in Blind Sculptor's Idol
नेत्रहीन शिल्पकार की मूर्ति में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन - फोटो : अमर उजाला

मूर्ति नहीं पहुंच पाई अयोध्या
कालांतर में इस मूर्ति को बैलगाड़ी से अयोध्या के एक मन्दिर में स्थापित करने के लिए ले जाया जा रहा था। भीलूड़ा में वर्तमान मन्दिर के समीप आकर बैलगाड़ी अटक गई लोगों ने लाख प्रयास किए, किंतु बैलगाड़ी एक इंच भी नहीं हिल पाई। इस पर तत्कालीन साधु-संतों एवं आचार्यों के मतानुसार मूर्ति को भीलूड़ा में स्थापित कर दिया गया।

पढ़ें- चैत्र नवरात्रि: आसलपुर धाम में आस्था का सैलाब, नवरात्रि अष्टमी पर मां आशापुरा के दरबार में उमड़े श्रद्धालु
 

Ram Navami Unique Confluence of Faith at Bhiluda Dham Witnessing Unity of Ram-Krishna in Blind Sculptor's Idol
नेत्रहीन शिल्पकार की मूर्ति में राम और कृष्ण की एकरूपता के दर्शन - फोटो : अमर उजाला

स्वत: खुल गए मंदिर पर लगे ताले
मंदिर के इतिहास से जुड़े घटनाक्रम अनुसार विक्रम संवत 1777 में श्रावण पूर्णिमा को नदी माही के किनारे नागर जाति के ब्राह्मण श्रावणी उपाकर्म के लिए एकत्रित हुए थे। तब नागर ब्राह्मणों ने उन्हीं के समाज के संत दुर्लभराम की परीक्षा लेने एवं उपहास के लिए भीलूड़ा के रघुनाथ मन्दिर पर ताला लगा दिया। सभी ने दुर्लभराम से कहा कि बड़े भक्त बनते हो। वागड़ के नृसिंह मेहता कहलाते हो। सच्चे भक्त हो तो यह ताला तुड़वाकर दिखाओ। तब संत दुर्लभराम ने तानपुरा लेकर भक्तिपूर्वक स्वरचित 13 पद गाए। भगवान की कृपा से मन्दिर के ताले अपने आप टूट गए। संत के 13 पद "भीलूड़ा के पद" पुस्तक में भी प्रकाशित किए गए हैं।
 

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Ram Navami Unique Confluence of Faith at Bhiluda Dham Witnessing Unity of Ram-Krishna in Blind Sculptor's Idol
भीलूड़ा के रघुनाथ मंदिर में स्थापित श्रीराम की प्रतिमा के चरण कमल - फोटो : अमर उजाला

आज भी पदों का गायन
संत दुर्लभराम के बाद वागड़ के ही संत हरिहरस्वरूप महाराज भी इस मन्दिर से जुड़े रहे। वे सदैव भीलूड़ा दर्शन के लिए आते थे। एक बार भगवान की कृपा का अनुभव होते ही "श्री रघुवर दयालु तू तो मेरा पार उतारन है,  दीनन पे दया करते रहना ये ही कारन है...." पद प्रतिमा के समक्ष अर्पित किया। उनके द्वारा रचित पद "अति रूड़ो भीलूडो धाम त्यां वसे मारो वालुडो" आज भी वागड़ में गाया जाता है।


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