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शत्रुओं पर विजय दिलाती है रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की पूजा, श्री राम को भी मिला था महादेव से आशीर्वाद

अनीता जैन, वास्तुविद् Published by: Madhukar Mishra Updated Fri, 26 Jul 2019 08:47 AM IST
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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग - फोटो : Rohit Jha

प्राचीन काल से ही भारत में तीर्थों की धार्मिक महत्ता रही है। इसी महत्व को बनाए रखने के लिए एवं विशाल भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए परम पवित्र चार धामों की स्थापना चार दिशाओं में की गई है। उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकापुरी, पूर्व में जगन्नाथपुरी तथा सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित है रामेश्वरम धाम। भौगोलिक दृष्टि से चार धाम एक परिपूर्ण वर्ग का निर्माण करते हैं, जिसमें बद्रीनाथ और रामेश्वरम एक देशांतर पर पड़ते हैं एवं द्वारका और जगन्नाथपुरी एक ही अक्षांश पर पड़ते हैं। 



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रामेश्वरम धाम हिन्दुओं के सभी पवित्र तीर्थों में से एक है तथा प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ ही यह तमिलनाडु के रामनाथपुरम् ज़िले में स्थित एक विशालकाय और भव्य मंदिर है। इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। पुराणों में रामेश्वरम का नाम गंधमादन बताया गया है।

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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग - फोटो : Rohit Jha

समुद्र से होकर जाता है रास्ता 

रामेश्वरम चेन्नई से लगभग 425 मील दक्षिण-पूर्व में है। यह हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुन्दर शंख के आकार का एक द्वीप है। काफी समय पूर्व यह द्वीप भारत की भूमि से जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने भारत और द्वीप के भूमि रास्ते को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। रामेश्वरम मंदिर जाने के लिए कंक्रीट के 145 खम्भों पर टिका करीब सौ साल पुराना पुल है। रामेश्वरम जाने वाले लोग इस पुल से होकर गुज़रते हैं। समुद्र के बीच से निकलती ट्रेन का दृश्य बहुत ही रोमांचक होता है। इस पुल के अलावा सड़क मार्ग से जाने के लिए एक और पुल भी बनाया गया है। यहां दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। द्रविड़ शैली में बना यह मंदिर निर्माण कला और शिल्प कला की सुंदरता का प्रतीक है। रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे बड़ा गलियारा है। 

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रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

रामायण काल से है जुड़ा शिवलिंग का इतिहास

यहां भगवान राम ने नल एवं नील नामक दो बलशाली वानरों की सहायता से लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व एक पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसे रामसेतु कहा गया। यह वही रामसेतु है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘एडेम्स ब्रिज’ के नाम से जाना जाता है। नल और नील को एक ऋषि का श्राप था कि तुम दोनों जिस वस्तु को भी पानी में फेकोगे वह नहीं डूबेगी। यही श्राप सेतु बनाते समय भगवान राम के काम आया, इसलिए वह दोनों योद्धा पत्थरों को जल में डालते गए और एक विशाल सेतु का निर्माण हो गया। जिस पर चढ़कर वानर सेना ने लंका पहुंच विजय पाई। बाद में श्री राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 30 मील (48  कि.मी.) लम्बे सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं। रामेश्वरम मंदिर में ये पत्थर आज भी भक्तों के दर्शन के लिए रखे गए हैं। 

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तब श्री राम ने यहां पर शिवलिंग को किया था स्थापित

वाल्मीकि रामायण के अनुसार इस मंदिर में जो शिवलिंग हैं, उसके पीछे मान्यता यह है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सीताजी को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जा रहे थे, तब उन्हें रास्ते में प्यास लगी। जब वे पानी पीने लगे तभी उनको याद आया कि उन्होंने भगवान शंकर के दर्शन नहीं किए हैं, ऐसे में वे कैसे जल ग्रहण कर सकते हैं। तब श्री राम ने विजय प्राप्ति के लिए बालू का शिवलिंग स्थापित करके शिव पूजन किया था, क्योंकि भगवान राम जानते थे कि रावण भी शिव का परम भक्त है और युद्ध में हरा पाना कठिन कार्य है, इसलिए भगवान राम ने लक्ष्मण सहित शिवजी की आराधना की और भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती के साथ प्रकट होकर श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। भगवान राम ने शिवजी से लोक कल्याण के लिए उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने को कहा जिसे भगवान शिव ने स्वीकार कर लिया। 

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