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Krishna Janmashtami: हर प्रेमी युगल को जाननी चाहिए राधा-कृष्ण के प्रेम की 5 अनोखी बातें

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Thu, 18 Aug 2022 12:17 PM IST
हर प्रेमी युगल को जाननी चाहिए राधा कृष्ण के प्रेम की अनोखी बातें
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Krishna Janmashtami : जहां कृष्ण, वहां राधा। भगवान श्रीकृष्ण का नाम ही राधा के नाम से जुड़ा हुआ है। आज भी लोग कान्हा को राधे कृष्ण, राधे श्याम कहकर पुकारते हैं। इसे कृष्ण और राधा के प्रेम की ताकत कह लें या भौतिकता से दूर अध्यात्म और आंतरिक मिलन की मिसाल कह लें, एक दूसरे के साथ न होने पर भी भगवान कृष्ण और राधा एक ही है। उनके प्रेम की मिसाल दी जाती है। दोनों बचपन में बरसाना और वृंदावन की गलियों में मिले। उन्हें प्रेम हुआ। पुराणों के मुताबिक, हर प्रेमी युगल की तरह वह भी एक दूसरे के साथ जीवन बिताना चाहते थे, विवाह करना चाहते थे लेकिन ऐसा हो न सका। कृष्ण मथुरा चले गए और एक राजा बन गए। कहा जाता है कि जाने से पहले कृष्ण ने राधा से वापस आने का वादा किया था। हालांकि कृष्ण कभी वापस मथुरा नहीं लौटे। कृष्ण और राधा की प्रेम कहानी से ये समझा जा सकता है कि उनके प्रेम कहानी अधूरी रह गई। दोनों का मिलन न हो सका। लेकिन अगर उनके प्रेम की गहराई को समझें तो राधा व कृष्ण कभी अलग थे ही नहीं तो उनके विवाह और भौतिक मिलन का क्या अर्थ। चलिए जानते हैं राधा कृष्ण के प्रेम की ऐसी अनोखी बातें, जो हर सच्चे प्रेमी युगल को जाननी चाहिए।
वृंदावन के निधिवन में आज भी कान्हा करते हैं रासलीला
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कृष्ण राधा की रासलीला

श्रीकृष्ण की रासलीला वृंदावन की गलियों में आज भी कहानी किस्सों की तरह सुनाई जाती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि कान्हा राधा जी के साथ शाम होने पर वन में रास रचाते थे। उनका साथ देने के लिए वन के पेड़ पौधे गोपियां बन जाया करती थीं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वृंदावन का निधिवन रासलीला का गवाह है। आज भी शाम की आरती के बाद निधिवन को बंद कर दिया जाता है। लोगों का मानना है कि भगवान रासलीला करने के लिए हर शाम यहां आते हैं। पेड़ गोपियां बन जाते हैं और कान्हा और राधा का मिलन होता है।

इस रासलीला को मनुष्य तो क्या पशु पक्षियां भी नहीं देखते। सभी निधिवन से दूर हो जाते हैं। मान्यता ये भी है कि जिस भी मनुष्य ने कन्हैया की रासलीला देखने की कोशिश की वह इसे बताने योग्य न रहा। या तो वह अपने होश खो बैठा या उसकी किसी कारण मौत हो गई। निधिवन में लगे तुलसी के पौधे जोड़ों में हैं। जो कृष्ण और राधा की रास लीला में शामिल होने के लिए गोपियों का रूप धारण कर लेती हैं।
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राधा और कृष्ण का प्रेम मिसाल क्यों है
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राधा-कृष्ण के प्रेम की अनोखी बातें

कृष्ण और राधा पति-पत्नी नहीं थे, उन्हें हमेशा से एक प्रेमी और प्रेमिका के रूप में जाना जाता है। कृष्ण की 16108 रानियां थीं, लेकिन हर मंदिर में, हर मुर्ति और हर तस्वीर में कृष्ण अपनी पत्नियों के साथ नहीं बल्कि राधा के साथ रहते हैं। 16108 रानियों पर एक मात्र राधा का प्रेम भारी पड़ जाता है। आखिर क्यों? राधा और कृष्ण के प्रेम की ऐसी क्या खासियत थी। चलिए जानते हैं राधा और कृष्ण के प्रेम एक मिसाल क्यों है?

अलग नहीं है राधा और कृष्ण

कृष्ण और राधा ने अपने प्रेम से यह बताया कि वह दोनों अलग नहीं है। कृष्ण अगर शरीर हैं तो राधा आत्मा हैं।  कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। उनमें से एक कहानी के मुताबिक, कान्हा के मथुरा जाने से पहले एक बार राधा रानी ने कृष्ण से पूछा कि वह उनसे विवाह क्यों नहीं कर सकते? इस पर कृष्ण ने कहा कि कोई अपनी आत्मा से विवाह करता है क्या। कृष्ण के इस जवाब से स्पष्ट है कि वह राधा जी से इतना प्रेम करते थे कि उनके लिए राधा उनका हृदय व आत्मा बन गईं थीं, जो हमेशा उनके साथ रहती थीं।
राधा कृष्ण में था बहुत अंतर
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सुंदरता और आयु का अंतर

प्रेम किसी से भी हो सकता है। प्रेम के बीच कभी आयु का बंधन नहीं होता। राधा रानी श्रीकृष्ण से आयु में बड़ी थीं, फिर भी कान्हा राधा से बहुत स्नेह करते थे। उन दोनों के लिए आयु कोई मायने नहीं रखती थी। इसी तरह कई विद्वानों के मुताबिक राधा दूध की तरह गोरी और सुंदर थीं, वहीं कान्हा सांवले थे। फिर भी दोनों एक दूसरे को भा गए। प्रेम हृदय से होता है, शक्ल और उम्र से नहीं।
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कृष्ण ने राधा से विवाह क्यों नहीं किया?
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प्रेम में विवाह जरूरी नहीं

भगवान श्रीकृष्ण विष्णु का अवतार हैं। उनका जन्म बड़े उद्देश्य से हुआ था। अपने ही मामा कंस की क्रूरता का अंत करने के साथ ही महाभारत काल में अधर्म पर धर्म की जीत के लिए पांडवों को मार्ग दिखाने के लिए कन्हैया इस पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। भले ही केशव की कई पत्नियां हुईं पर राधा से उनका विवाह नहीं हुआ। कृष्ण इस सृष्टि को यह सीख देना चाहते थे कि प्रेम में विवाह आवश्यक नहीं। प्रेम अपने आप में पूर्ण है। अगर प्रेम मुकाम तक नहीं पहुंचता तो हार मानकर अपने कर्तव्यों से विमुख न हों, बल्कि उसे सदैव आत्मा में समाकर अपने लक्ष्यों की पूर्ति की ओर अग्रसर रहें।
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