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शिक्षक दिवस 2019ः इसलिए हिंदू धर्म के प्रति गहरी आस्था थी डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन में
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teacher day 2018 importance of teachers day
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भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन देश के द्वितीय राष्ट्रपति भी बने। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक विख्यात हिन्दू दार्शनिक और आस्थावान हिन्दू विचारक भी थे। हिंदू धर्म के दार्शनिक पक्ष पर उनका चिंतन बेहद अलग था।
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धार्मिक विचारधार ने कैसे आकर्षित किया
डॉ. राधाकृष्णन बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे उन्होंने हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का गहन अध्ययन प्रारम्भ कर दिया।
राधाकृष्णन ये जानना चाहते थे कि किस संस्कृति के विचारों में चेतना है। उन्होंने जब अध्ययन करना प्रारम्भ किया तो देखा हिन्दू संस्कृति का ज्ञान एक अनपढ़ व्यक्ति को भी है और पाया कि हिन्दू धर्म कि नींव काफी पुरानी है।
यही नहीं हर बात जो ग्रंथों में कही गई है उसके पुख्ता प्रमाण हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ये जान लिया था कि भारतीय संस्कृति काफी समृद्धि है। दूसरे धर्मों के लोगों के तर्क और विचार हिन्दू संस्कृति के लिए गलत और निराधार है।
डॉ. राधाकृष्णन बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे उन्होंने हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का गहन अध्ययन प्रारम्भ कर दिया।
राधाकृष्णन ये जानना चाहते थे कि किस संस्कृति के विचारों में चेतना है। उन्होंने जब अध्ययन करना प्रारम्भ किया तो देखा हिन्दू संस्कृति का ज्ञान एक अनपढ़ व्यक्ति को भी है और पाया कि हिन्दू धर्म कि नींव काफी पुरानी है।
यही नहीं हर बात जो ग्रंथों में कही गई है उसके पुख्ता प्रमाण हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ये जान लिया था कि भारतीय संस्कृति काफी समृद्धि है। दूसरे धर्मों के लोगों के तर्क और विचार हिन्दू संस्कृति के लिए गलत और निराधार है।
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- फोटो : pixa
भारतीय संस्कृति का ज्ञान
हिंदू धर्म का विशद् अध्ययन करने के बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ये जान लिया था कि जीवन काफी छोटा है और इसमें अपार संभावनाएं हैं। उनका मानना था कि जीवन मे सुख-दुख बने रहते हैं और व्यक्ति को समभाव से रहना चाहिए।
डॉ. सर्वपल्ली के अनुसार मृत्यु एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता, अमीर-गरीब सभी को यह आनी है। मृत्यु ही ऐसी हो जो कभी किसी तरह का भेदभाव किसी के साथ भी नहीं करती है।
उनके अनुसार सच्चा ज्ञान वही है जो अंदर के अज्ञान को मिटा दे। मन-मस्तिष्क में एक नया जोश और उमंग भर दे। आलोचनाएं शुद्धिकरण का कार्य करती है।
हिंदू धर्म का विशद् अध्ययन करने के बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ये जान लिया था कि जीवन काफी छोटा है और इसमें अपार संभावनाएं हैं। उनका मानना था कि जीवन मे सुख-दुख बने रहते हैं और व्यक्ति को समभाव से रहना चाहिए।
डॉ. सर्वपल्ली के अनुसार मृत्यु एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता, अमीर-गरीब सभी को यह आनी है। मृत्यु ही ऐसी हो जो कभी किसी तरह का भेदभाव किसी के साथ भी नहीं करती है।
उनके अनुसार सच्चा ज्ञान वही है जो अंदर के अज्ञान को मिटा दे। मन-मस्तिष्क में एक नया जोश और उमंग भर दे। आलोचनाएं शुद्धिकरण का कार्य करती है।
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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार जीवन
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने संपूर्ण विश्व को एक विद्यालय माना। उन्होंने शिक्षा पर हमेशा ज़ोर दिया। उनका मानना था कि शिक्षा द्वारा ही विकास संभव है। शिक्षा के माध्यम से ही मानव अपने मन-मस्तिष्क का उपयोग बेहतर ढंग से कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था संपूर्ण विश्व को एक मान कर ही होनी चाहिए। इस बात पर उनका पुरज़ोर मत था। बेहतरीन शिक्षा से ही विश्व मे शांति व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने संपूर्ण विश्व को एक विद्यालय माना। उन्होंने शिक्षा पर हमेशा ज़ोर दिया। उनका मानना था कि शिक्षा द्वारा ही विकास संभव है। शिक्षा के माध्यम से ही मानव अपने मन-मस्तिष्क का उपयोग बेहतर ढंग से कर सकता है। शिक्षा व्यवस्था संपूर्ण विश्व को एक मान कर ही होनी चाहिए। इस बात पर उनका पुरज़ोर मत था। बेहतरीन शिक्षा से ही विश्व मे शांति व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।
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शिक्षक दिवस
- फोटो : टीम डिजिटल
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय थे। वे छोटी-छोटी आनंदमय कथाओं से बच्चों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। ज्ञान का भंडार थे वो जहां कही भी जाते वहां ज्ञान कि धाराएं बह जाती थी। यही कारण है कि उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।