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पांच साल बाद विश्वकप में गूंजा भारत का नाम: धीरज ने जीते दो स्वर्ण; मां ने मंगलसूत्र गिरवी रखकर कराई थी तैयारी

स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: स्वप्निल शशांक Updated Mon, 15 Jun 2026 01:28 PM IST
सार

भारत के तीरंदाज धीरज बोम्मादेवरा ने तुर्किये के अंताल्या में विश्वकप स्टेज-3 में दो स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। लेकिन इस सफलता के पीछे संघर्ष, त्याग और परिवार के भरोसे की लंबी कहानी छिपी है। एक समय ऐसा था जब उपकरण खरीदने के लिए उनकी मां को अपना मंगलसूत्र गिरवी रखना पड़ा था, जबकि पिता बेटे का सपना पूरा करने के लिए खुद तीरंदाजी के जज बन गए थे। अब धीरज ने विश्व मंच पर दो स्वर्ण जीतकर अपने माता-पिता के त्याग को सार्थक कर दिया है।

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Mother Mortgaged Her Mangalsutra, Father Became an Archery Judge: Dhiraj's Journey to Double World Cup Gold
धीरज - फोटो : ANI
तुर्किये के अंताल्या में जब भारतीय तीरंदाज धीरज बोम्मादेवरा पोडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान सुन रहे थे, तब यह सिर्फ दो स्वर्ण पदकों की कहानी नहीं थी। यह एक ऐसे परिवार की जीत थी जिसने आर्थिक तंगी, संघर्ष और अनिश्चितताओं के बीच अपने बेटे के सपने को जिंदा रखा।


24 वर्षीय धीरज ने विश्व तीरंदाजी विश्वकप स्टेज-तीन में दो स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने पहले 17 वर्षीय कुमकुम मोहोड के साथ रिकर्व मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण जीता और फिर पुरुष व्यक्तिगत रिकर्व वर्ग के फाइनल में दक्षिण कोरिया के स्टार तीरंदाज ली वू सियोक को हराकर दूसरा स्वर्ण अपने नाम किया।
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धीरज - फोटो : ANI
पिता ने बेटे के लिए बदल दी जिंदगी
धीरज के पिता श्रवण कुमार खेलों के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने बेटे को बैडमिंटन, फुटबॉल, टेनिस और क्रिकेट से परिचित कराया, लेकिन धीरज का मन कहीं नहीं लगा। एक दिन उनकी नजर तीरंदाजी का अभ्यास कर रहे खिलाड़ियों पर पड़ी और यहीं से सफर शुरू हुआ। धीरज की मदद करने के लिए श्रवण कुमार ने खुद तीरंदाजी को समझना शुरू किया। बाद में उन्होंने तीरंदाजी संघ की जज परीक्षा पास की और आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ तीरंदाजी जजों में शामिल हो गए। श्रवण कुमार ने कहा, 'मैंने खुद तीरंदाजी सीखी ताकि हर कदम पर बेटे का मार्गदर्शन कर सकूं। यह सिर्फ उसका नहीं, हमारा साझा सफर था।'
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धीरज - फोटो : ANI
जब मां ने गिरवी रखा मंगलसूत्र
धीरज के करियर का सबसे मुश्किल दौर 2017 में आया। बेहतर प्रशिक्षण के लिए उन्हें महंगे विदेशी उपकरणों की जरूरत थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती थी। हालात ऐसे हो गए कि धीरज तीरंदाजी छोड़ने तक का मन बना चुके थे। तभी उनकी मां रेवती ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपना मंगलसूत्र गिरवी रखकर कर्ज लिया ताकि बेटे के लिए नया धनुष खरीदा जा सके। धीरज आज भी उस पल को याद करते हैं। उन्होंने कहा, 'एक समय ऐसा था जब मैं तीरंदाजी छोड़ने वाला था। मेरी मां ने अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया ताकि मैं धनुष खरीद सकूं। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है।'
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धीरज - फोटो : ANI
पेरिस की निराशा से अंताल्या की जीत तक
दो साल पहले पेरिस ओलंपिक में धीरज पदक के बेहद करीब पहुंचकर चूक गए थे। वह भारत को तीरंदाजी में पहला ओलंपिक पदक दिलाने से बस एक कदम दूर रह गए थे। उस हार ने उन्हें तोड़ा जरूर, लेकिन रोका नहीं। अंताल्या में उन्होंने उसी दक्षिण कोरिया के तीरंदाजों को हराकर दो स्वर्ण पदक जीते, जिनके खिलाफ भारतीय तीरंदाजी टीम अक्सर दबाव महसूस करती थी।
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धीरज - फोटो : ANI
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने दी बधाई
आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर और मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने धीरज को इस उपलब्धि पर बधाई दी। नायडू ने कहा कि दक्षिण कोरिया के मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को हराकर स्वर्ण जीतना धीरज की असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।
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